नई दिल्ली: करीब एक दशक के लंबे इंतजार के बाद National Stock Exchange यानी NSE का IPO आखिरकार आम निवेशकों के लिए खुल गया है। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज के इस IPO को लेकर बाजार में काफी उत्सुकता है। 17 सितंबर से शुरू हुआ यह IPO 21 सितंबर तक खुला रहेगा। इसके लिए ₹1,700 से ₹1,785 प्रति शेयर का मूल्य दायरा तय किया गया है। ऊपरी स्तर पर NSE का मूल्यांकन करीब ₹4.42 लाख करोड़ बैठता है।
इतने बड़े आकार के IPO के बीच सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि NSE कितनी बड़ी कंपनी है। यह तो साफ है कि भारतीय शेयर बाजार में उसकी पकड़ बेहद मजबूत है। असली सवाल यह है कि जिस कीमत पर NSE बाजार में उतर रही है, क्या वह उसकी मौजूदा कमाई और भविष्य की संभावनाओं को सही तरह दर्शाती है?
NSE के IPO की एक खास बात यह है कि इससे मिलने वाला पूरा पैसा कंपनी के पास नहीं जाएगा। यह पूरा इश्यू Offer for Sale यानी OFS है। इसमें NSE के मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेच रहे हैं। कंपनी नए शेयर जारी करके पूंजी नहीं जुटा रही।
इसका सीधा मतलब है कि IPO के बाद NSE के पास विस्तार या नए कारोबार के लिए कोई अतिरिक्त IPO पूंजी नहीं आएगी। निवेशक जिस चीज में हिस्सेदारी खरीदेंगे, वह NSE का पहले से चल रहा कारोबार और उससे भविष्य में होने वाली कमाई है। यही वजह है कि इस IPO को समझने के लिए कंपनी के कारोबार और उसकी कमाई के स्रोत को देखना ज्यादा जरूरी हो जाता है।
NSE की सबसे बड़ी ताकत उसकी बाजार हिस्सेदारी और कारोबार का पैमाना है। देश के Cash Market में उसकी हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि Equity Futures में भी उसका दबदबा बेहद मजबूत है। जून 2026 तक NSE से जुड़े पंजीकृत निवेशकों की संख्या 13 करोड़ से ज्यादा हो चुकी थी।
NSE सिर्फ शेयरों की खरीद-बिक्री का मंच नहीं है। इसके कारोबार में शेयर बाजार के अलावा Futures और Options, सूचकांक, बाजार से जुड़े आंकड़े, तकनीकी सेवाएं और अन्य वित्तीय गतिविधियां भी शामिल हैं। NIFTY जैसे प्रमुख सूचकांकों के कारण भी NSE की भूमिका भारतीय पूंजी बाजार में काफी महत्वपूर्ण है।
भारत में शेयर बाजार से जुड़ने वाले नए निवेशकों की संख्या बढ़ रही है। कंपनियों की सूचीबद्धता बढ़ रही है और बाजार में कारोबार का दायरा भी लगातार फैल रहा है। ऐसे माहौल में NSE के पास आगे बढ़ने की गुंजाइश जरूर है। लेकिन यहीं से इसकी कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है।
NSE की कमाई का बड़ा हिस्सा लेनदेन शुल्क से आता है। खासकर Futures और Options यानी डेरिवेटिव कारोबार इसकी आय का महत्वपूर्ण आधार है। वित्त वर्ष 2025-26 में NSE की परिचालन आय करीब ₹16,600 करोड़ रही, जबकि मुनाफा करीब ₹10,300 करोड़ रहा।
मुनाफा बड़ा है, लेकिन पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इसमें करीब 15 प्रतिशत की कमी आई। इसकी एक बड़ी वजह डेरिवेटिव कारोबार में बदलाव और उससे जुड़ी गतिविधियों में आई कमी रही।
यही NSE के IPO का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
अगर शेयर बाजार में कारोबार बढ़ता है और निवेशक ज्यादा लेनदेन करते हैं तो NSE की लेनदेन शुल्क से होने वाली कमाई बढ़ सकती है। लेकिन अगर कारोबार की मात्रा घटती है या नियमों में ऐसे बदलाव होते हैं जिनसे Futures और Options की गतिविधि प्रभावित होती है, तो NSE की आय पर भी असर पड़ सकता है।
पिछले कुछ समय में बाजार नियामक सेबी ने डेरिवेटिव कारोबार को लेकर कई कदम उठाए हैं। इसका उद्देश्य छोटे निवेशकों के जोखिम को कम करना और बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी पर लगाम लगाना है। ऐसे नियम NSE के कारोबार के लिए सीधे तौर पर चुनौती नहीं हैं, लेकिन उनका असर बाजार में होने वाली गतिविधियों पर पड़ सकता है।
IPO के ऊपरी मूल्य दायरे पर NSE का मूल्यांकन वित्त वर्ष 2025-26 की कमाई के करीब 43 गुना के बराबर बैठता है। यानी निवेशक कंपनी की मौजूदा कमाई के मुकाबले काफी ऊंची कीमत पर शेयर खरीद रहे होंगे।
हालांकि, सिर्फ इस आंकड़े के आधार पर NSE को महंगा या सस्ता कहना सही नहीं होगा। किसी कंपनी का मूल्यांकन समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसकी बाजार स्थिति कितनी मजबूत है, कमाई कितनी टिकाऊ है और आने वाले वर्षों में उसके कारोबार के बढ़ने की कितनी गुंजाइश है।
NSE के मामले में उसकी मजबूत बाजार हिस्सेदारी एक बड़ी ताकत है। दूसरी ओर, कमाई का बड़ा हिस्सा कारोबार की मात्रा और खासकर डेरिवेटिव गतिविधियों से जुड़ा होना एक जोखिम भी है।
कंपनी अब लेनदेन आधारित आय पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रही है। बाजार से जुड़े आंकड़े, तकनीकी सेवाएं, सूचकांक, डेटा और GIFT City से जुड़ी गतिविधियां भविष्य में आय के दूसरे स्रोत बन सकती हैं।
अगर इन कारोबारों का योगदान बढ़ता है तो NSE की कमाई सिर्फ रोज होने वाले शेयर और डेरिवेटिव कारोबार पर कम निर्भर रह सकती है। यही बदलाव लंबे समय में कंपनी के कारोबार को ज्यादा विविध बना सकता है।
हालांकि, इन क्षेत्रों से होने वाली संभावित वृद्धि को अभी निश्चित कमाई मानना सही नहीं होगा। NSE की आगे की कमाई पर बाजार की गतिविधि, निवेशकों की भागीदारी और नियामकीय बदलावों का असर बना रहेगा।
NSE की तुलना स्वाभाविक रूप से BSE से की जा रही है, क्योंकि BSE पहले से शेयर बाजार में सूचीबद्ध प्रमुख एक्सचेंज है। NSE का मूल्यांकन करीब 43 गुना कमाई पर है, जबकि BSE इससे ज्यादा मूल्यांकन पर कारोबार करता है।
लेकिन सिर्फ इस अंतर से NSE के IPO को बेहतर या खराब कहना सही नहीं होगा। दोनों एक्सचेंजों की बाजार हिस्सेदारी, कारोबार की संरचना और आय के स्रोत एक जैसे नहीं हैं। इसलिए तुलना करते समय केवल शेयर की कीमत या कमाई के अनुपात के बजाय पूरे कारोबार को देखना जरूरी है।
NSE IPO की सबसे दिलचस्प बात यही है कि निवेशकों के सामने एक ऐसी कंपनी आ रही है, जिसकी भारतीय शेयर बाजार में मजबूत पकड़ है और जो लंबे समय से लाभ कमा रही है। लेकिन उसी समय उसकी कमाई का बड़ा हिस्सा बाजार में होने वाले लेनदेन पर निर्भर है और डेरिवेटिव कारोबार में बदलाव का असर पहले ही दिखाई दे चुका है।
इसलिए NSE IPO को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि ₹1,700 से ₹1,785 का शेयर कितना आकर्षक दिख रहा है। असली सवाल यह है कि क्या NSE आने वाले वर्षों में अपनी मजबूत बाजार स्थिति को लगातार और टिकाऊ कमाई में बदल पाएगी।
यही उसकी मौजूदा Valuation को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होगी।