नई दिल्ली : जी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा की कर्ज भुगतान योजना से जुड़े मामले में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने बुधवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा। पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने कहा कि सीबीआई की जांच का मामले की कार्यवाही पर असर पड़ सकता है। पीठ ने पीठों की कमी के कारण सुनवाई भी स्थगित कर दी। चंद्रा की ओर से सीबीआई को मामले में पक्षकार बनाने का विरोध किया गया।
विवाद का केंद्र चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी के तहत देनदारी, उनकी भुगतान योजना को असहमत कर्जदाताओं पर बाध्यकारी बनाने और योजना को मंजूरी देने वाली मतदान प्रक्रिया की वैधता है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, करीब 2,574 करोड़ रुपये के दावे उन ऋणों से जुड़े हैं, जिनके लिए चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। चंद्रा का कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से कर्ज नहीं लिया था। उन्होंने अपनी 31.79 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति के आधार पर भुगतान प्रस्ताव तैयार किया था।
योजना में कुल 6.5 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव था। इसमें 6.25 करोड़ रुपये कर्जदाताओं को और 25 लाख रुपये दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए रखे गए थे। योजना को मूल्य के आधार पर 80.81 प्रतिशत कर्जदाताओं का समर्थन मिला था। एनसीएलटी सदस्य नीलेश शर्मा ने इसे मंजूरी देते हुए कहा था कि यह विरोध करने वाले कर्जदाताओं पर भी लागू होगी। विरोध करने वालों में एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, आईडीबीआई ट्रस्टीशिप सर्विसेज, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यूके) और आरबीएल बैंक शामिल थे।
मामले में फरवरी में दो सदस्यीय पीठ के बीच मतभेद सामने आया था। इसके बाद तीसरे सदस्य के रूप में शामिल शर्मा ने योजना को मंजूरी दी। हालांकि, एक सितंबर को न्यायमूर्ति अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने स्पष्ट किया कि शर्मा का 25 अगस्त का आदेश न्यायाधिकरण का बहुमत मत नहीं था, इसलिए उसे प्रभावी नहीं किया जा सकता। अंतिम निर्णय तक योजना को मंजूरी देने वाले आदेश पर रोक भी लगी हुई है।
बुधवार को पीठ ने कहा कि विशेष पीठ में सुनवाई जारी रहने से एनसीएलटी के कामकाज पर असर पड़ सकता है। पीठ में अध्यक्ष न्यायमूर्ति ग्रेवाल, न्यायिक सदस्य बाचू वेंकट बलराम दास और महेंद्र खंडेलवाल दास तथा तकनीकी सदस्य अतुल चतुर्वेदी और रवींद्र चतुर्वेदी शामिल हैं। पीठ ने सभी पक्षों को अगली सुनवाई से पहले अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
न्यायाधिकरण ने मामले के लंबित रहने तक चंद्रा को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी कोई संपत्ति बेचने या हस्तांतरित करने से भी रोक रखा है। यह निर्देश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से कर्जदाताओं का पक्ष रखते हुए संपत्तियों की सुरक्षा की मांग के बाद दिया गया था।
मतदान प्रक्रिया को लेकर भी विवाद है। एक कर्जदाता ने आरोप लगाया कि समाधान पेशेवर ने पांच संस्थाओं-वीना इन्वेस्टमेंट्स, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स, लेमनेड कैपिटल एडवाइजर्स और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइजर्स के दावे गलत तरीके से स्वीकार किए। इन संस्थाओं के पास कुल 61.78 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी थी। शर्मा ने हालांकि इन्हें संबंधित पक्ष साबित करने वाला कोई साक्ष्य नहीं पाया। चंद्रा के कार्यालय के अनुसार, ये कंपनियां उनके छोटे भाई जवाहर गोयल की थीं और 2008-09 में पारिवारिक कारोबारी बंटवारे के दौरान दोनों के व्यावसायिक हित अलग हो गए थे।
चंद्रा ने पांच सदस्यीय पीठ के गठन और भुगतान योजना पर लगी रोक को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में भी चुनौती दी है। फिलहाल एनसीएलटी ने सीबीआई से जवाब मांगा है और मामले में सभी पक्षों की दलीलें अगली सुनवाई में दर्ज की जाएंगी।