नई दिल्ली : भारत में 96 प्रतिशत संगठनों को पिछले 12 महीनों में कम-से-कम एक ऐसी साइबर घटना का सामना करना पड़ा, जिससे उनका कारोबार प्रभावित हुआ। इनमें एक-तिहाई से अधिक मामलों में कृत्रिम मेधा (एआई) से उन्नत हमले शामिल थे। प्रौद्योगिकी कंपनी सिस्को की बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। यह रिपोर्ट 30 बाजारों के 8,000 सुरक्षा पेशेवरों के बीच किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें भारत के 1,000 प्रतिभागी शामिल थे। रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर सुरक्षा मजबूत करने में प्रौद्योगिकी सीमाओं से अधिक संगठन के भीतर की व्यवस्थागत बाधाएं चुनौती बन रही हैं। इनमें मंजूरी में देरी, अलग-अलग प्रणालियों में बंटा डेटा और टीमों के बीच समन्वय की कमी शामिल हैं। भारत में केवल 40 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि सुरक्षा, नेटवर्किंग और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) टीमें साझा प्रणालियों और सूचनाओं के साथ एकजुट होकर काम करती हैं। वहीं, 44 प्रतिशत संगठनों ने बताया कि वे वास्तविक खतरों से निपटने की तुलना में अलग-अलग प्रणालियों से डेटा जुटाने और उसका मिलान करने में अधिक समय लगाते हैं। करीब 43 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि अलग-अलग प्रणालियों में बंटे डेटा तक पहुंच न होने के कारण महत्वपूर्ण सूचनाएं सामने नहीं आ पातीं। रिपोर्ट में भारत का औसत स्कोर 100 में 66 रहा, जो 64 के वैश्विक औसत से थोड़ा अधिक है। हालांकि, केवल आठ प्रतिशत भारतीय संगठन ही सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली श्रेणी में आए। वैश्विक स्तर पर भी यह आंकड़ा आठ प्रतिशत रहा। दूसरी ओर, एआई के इस्तेमाल से सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के संकेत मिले हैं। 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय सुरक्षा पेशेवरों ने एआई की मदद से साइबर खतरे का पता लगाने और प्रतिक्रिया देने की क्षमता में कम-से-कम 25 प्रतिशत सुधार की बात कही। इसके बावजूद, सुरक्षा परिचालन में एआई एजेंट को बड़े स्तर पर लागू करने वाले संगठनों का हिस्सा अभी 40 प्रतिशत है। डेटा उजागर होने और प्रणालियों से छेड़छाड़ जैसी चिंताओं के कारण इसका इस्तेमाल अभी सतर्कता के साथ किया जा रहा है।