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भारत हर साल बचा सकता है 28,540 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा

इन शुल्कों को लागू किया जाए तो घरेलू विनिर्माता आयात की जगह मांग पूरी कर सकेंगे

नयी दिल्ली : भारत में अनुशंसित डंपिंग-रोधी शुल्क लागू नहीं किए जाने से घरेलू उद्योग को सालाना 11,938 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। वहीं इन शुल्कों को लागू करने से आयात में आने वाली कमी से हर साल 28,540 करोड़ रुपये की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है।

क्या है कारण : वाणिज्य मंत्रालय के तहत संचालित व्यापार उपचार महानिदेशालय (डीजीटीआर) सस्ते माल को भारत में खपाने (डंपिंग) की जांच करता है, जबकि इन शुल्कों को लागू करने का अंतिम निर्णय वित्त मंत्रालय लेता है। सी-डीईपी रिसर्च और सेंटर फॉर डब्ल्यूटीओ स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजीटीआर द्वारा 56 उत्पादों पर अनुशंसित डंपिंग-रोधी शुल्क लागू नहीं होने से यह नुकसान हो रहा है। यदि इन शुल्कों को लागू किया जाए तो घरेलू विनिर्माता आयात की जगह मांग पूरी कर सकेंगे, जिससे विदेशी मुद्रा की खासी बचत होगी। डंपिंग-रोधी शुल्क ऐसे उपाय हैं, जिनका उपयोग सरकारें घरेलू उद्योग को विदेशी कंपनियों द्वारा कम कीमत पर की जाने वाली बिक्री से बचाने के लिए करती हैं। डंपिंग तब होती है, जब कोई उत्पाद अपने घरेलू बाजार की तुलना में कम कीमत पर दूसरे देश में निर्यात किया जाता है।

1.54 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान : रिपोर्ट के मुताबिक, 33 उत्पादों के अध्ययन में पाया गया कि सस्ते आयात के कारण वर्तमान में करीब 1.54 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो रहा है, जो 2030 तक बढ़कर 2.70 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। इसी अवधि में रोजगार हानि भी लगभग 24,000 से बढ़कर 38,000-42,000 तक पहुंचने का अनुमान है।

रुझान में बदलाव : हाल के वर्षों में डीजीटीआर की सिफारिशों को लागू करने के रुझान में बदलाव आया है। वर्ष 2020 तक जहां लगभग 99.5 प्रतिशत सिफारिशें लागू हो जाती थीं, वहीं नवंबर, 2025 से अप्रैल, 2026 के बीच सिफारिशों को अस्वीकार किए जाने की दर बढ़कर 81 प्रतिशत हो गई, जो इससे पहले अप्रैल-नवंबर, 2025 में 16 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में डंपिंग-रोधी शुल्क औसतन 16.26 वर्षों तक लागू रहते हैं, जबकि भारत में यह अवधि करीब 6.97 वर्ष है। रिपोर्ट कहती है कि इन शुल्कों को समय पर लागू करना घरेलू उद्योग की क्षमता और निवेश को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

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