मुकेश अंबानी ने अपने पिता धीरूभाई अंबानी के सपने को वैश्विक स्तर तक पहुंचाया। अब जानिए उस बातचीत के बारे में, जिसने भारत के लोगों के एक-दूसरे से जुड़ने का तरीका बदल दिया।गुजरात के किसी गांव में बैठा एक परिवार मुंबई, दुबई या अमेरिका के न्यू जर्सी में काम करने वाले अपने बच्चे से वीडियो कॉल पर बात कर सकता है। एक छोटा दुकानदार मोबाइल फोन के जरिए नए ग्राहकों तक पहुंच सकता है। कोई विद्यार्थी ऑनलाइन कक्षा में पढ़ाई कर सकता है। मनोरंजन से लेकर बैंकिंग और पैसों के लेन-देन तक, कई सुविधाएं अब लोगों के हाथ में मौजूद मोबाइल फोन पर उपलब्ध हैं।आज भारत में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी इन सुविधाओं के विस्तार में जियो की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सितंबर 2016 में जियो की व्यावसायिक सेवाएं शुरू हुईं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में भारतीयों के लिए सस्ता मोबाइल इंटरनेट उपलब्ध होने लगा। कुछ साल पहले तक जिस स्तर पर मोबाइल डेटा की उपलब्धता की कल्पना करना भी मुश्किल लगता था, वह धीरे-धीरे आम लोगों की पहुंच में आ गया।लेकिन जियो की शुरुआत किसी बड़ी कारोबारी योजना या भव्य आयोजन से नहीं, बल्कि इंटरनेट की धीमी गति से परेशान एक परिवार के अनुभव से हुई थी।
कई बार बड़े कारोबारी विचार किसी बहुत साधारण अनुभव से जन्म लेते हैं। जियो की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वर्ष 2011 में ईशा अंबानी येल विश्वविद्यालय से घर आई हुई थीं। वह अपने कोर्स का काम पूरा करने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन घर का इंटरनेट बार-बार परेशानी पैदा कर रहा था। इंटरनेट की गति अच्छी नहीं थी और काम करना मुश्किल हो रहा था।मुकेश अंबानी ने बाद में सार्वजनिक रूप से इस घटना का जिक्र करते हुए बताया था कि ईशा ने शिकायत की थी कि घर का इंटरनेट ठीक से काम नहीं करता। यह परेशानी केवल अंबानी परिवार की नहीं थी। उस समय देश के लाखों परिवारों को भी धीमे इंटरनेट और सीमित डिजिटल सुविधाओं की समस्या का सामना करना पड़ता था। लेकिन इस छोटी-सी शिकायत ने एक ऐसे बदलाव की नींव रखी, जिसने आगे चलकर पूरे देश में इंटरनेट के इस्तेमाल का तरीका बदल दिया।
ईशा की परेशानी को आकाश अंबानी ने एक अलग नजरिए से देखा। मुकेश अंबानी की पीढ़ी के लिए दूरसंचार का मतलब मुख्य रूप से फोन पर बातचीत करना था। कितनी देर बात हुई, एक मिनट की दर क्या है और फोन करने में कितना खर्च आएगा, दूरसंचार की दुनिया इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूमती थी।लेकिन आकाश अंबानी की पीढ़ी के लिए इंटरनेट पहले ही जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था। पढ़ाई करनी हो, मनोरंजन चाहिए हो, खरीदारी करनी हो, बैंकिंग का काम करना हो या परिवार और दोस्तों से संपर्क बनाए रखना हो, इंटरनेट हर जगह उपयोगी था।आकाश का तर्क था कि भविष्य केवल आवाज के जरिये बातचीत करने का नहीं, बल्कि डेटा का है। इंटरनेट और मोबाइल डेटा आने वाले समय में लोगों की जरूरतों का केंद्र बनने वाले हैं।मुकेश अंबानी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि ब्रॉडबैंड और भारत के डिजिटल भविष्य को लेकर ईशा और आकाश के विचारों ने उनकी सोच को प्रभावित किया।एक शाम की बातचीत में तीन पीढ़ियों की सोच का अंतर साफ दिखाई देता था। धीरूभाई अंबानी ने भारत के छोटे निवेशकों में छिपी संभावनाओं को पहचाना था। मुकेश अंबानी ने समझा कि भारत की महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप बड़े पैमाने पर उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। आकाश अंबानी ने देखा कि इंटरनेट केवल संपन्न लोगों की सुविधा बनकर नहीं रहेगा, बल्कि आम आदमी के जीवन के लिए जरूरी बुनियादी सुविधा बन जाएगा। यही विश्वास जियो की नींव बना।
जियो की असली परीक्षा वर्ष 2020 में हुई। कोरोना महामारी के कारण जब देश में जनजीवन ठहर गया, तब घरों की भूमिका अचानक बदल गई। घर ही स्कूल बन गए, कार्यालय बन गए और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ने का माध्यम भी बन गए। ऐसे समय में जियो का नेटवर्क लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा साबित हुआ।सस्ते डेटा की मदद से विद्यार्थी अपनी पढ़ाई जारी रख सके। नौकरी करने वाले लोग घर से काम कर सके। छोटे कारोबारियों को ग्राहकों तक पहुंच बनाए रखने में मदद मिली। लॉकडाउन के कारण एक-दूसरे से दूर हुए परिवार वीडियो कॉल के जरिये संपर्क में रह सके।इस कठिन दौर में जियो ने अपने कम कीमत वाले जियोफोन के उपयोगकर्ताओं को मुफ्त कॉलिंग की सुविधा और अतिरिक्त डेटा भी दिया, ताकि सबसे कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों का संपर्क पूरी तरह न टूटे।इसी दौरान कंपनी ने अपना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मंच जियोमीट भी शुरू किया। देश में जब बैठकें और दूसरे काम ऑनलाइन होने लगे थे, तब इस मंच ने लोगों को इंटरनेट के जरिये आपस में जुड़ने का एक और विकल्प दिया। भारत के सबसे कठिन दौर में से एक ने यह साबित कर दिया कि डिजिटल संपर्क अब केवल सुविधा या मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है। जिस तरह बिजली और पानी जीवन के लिए जरूरी हैं, उसी तरह इंटरनेट से जुड़ाव भी शिक्षा, रोजगार, कारोबार और पारिवारिक संपर्क के लिए महत्वपूर्ण बन चुका है।एक परिवार की बातचीत से जन्मे कारोबारी विचार ने पूरे देश की आदतों और काम करने के तरीकों को बदलने में भूमिका निभाई। इस यात्रा के अगले चरण में आकाश अंबानी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।
धीमे इंटरनेट से परेशान एक परिवार की छोटी-सी समस्या से शुरू हुई यह कहानी ऐसे नेटवर्क तक पहुंची, जिसने देश के कठिन महीनों में लाखों लोगों को पढ़ाई, काम और बातचीत जारी रखने में मदद की।रिलायंस की इस यात्रा में एक विचार लगातार दिखाई देता है। धीरूभाई अंबानी से मुकेश अंबानी और फिर आकाश अंबानी तक आगे बढ़ी सोच यह रही कि जो सुविधा पहले कुछ लोगों तक सीमित है, उसे अधिक से अधिक लोगों की पहुंच में लाया जाए।वर्ष 1977 में यह विचार उद्योगों में आम लोगों की हिस्सेदारी के रूप में सामने आया था। वर्ष 2016 में जियो के जरिये इंटरनेट को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने के रूप में इसका नया रूप दिखाई दिया। इस पूरी यात्रा में गुजरात को भी हर चरण में लाभ मिला है। रिलायंस की कहानी में राज्य की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही है और आगे के चरण में भी यह भूमिका बनी रहने की उम्मीद है।इस यात्रा में अब तक भागीदार रहे लोग और समुदाय इसके अगले अध्याय का भी हिस्सा बनना चाहेंगे।