बिजनेस

गैर-जरूरी आयात पर अंकुश जरूरी

अनिश्चितकाल तक सब्सिडी देने जैसे पारंपरिक राजकोषीय उपाय अब टिकाऊ नहीं

नयी दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत को अपनी निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए करों में नरमी, गैर-जरूरी आयात पर लक्षित अंकुश और व्यापारिक उपायों के समयबद्ध क्रियान्वयन जैसे कदम उठाने की जरूरत है। ‘थिंक चेंज फोरम’ की इस रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर दबाव के दौर से गुजर रही है और पश्चिम एशिया की अस्थिरता के कारण ऊर्जा, कृषि एवं विनिर्माण जैसे अहम क्षेत्रों में लागत बढ़ाने वाली महंगाई बढ़ रही है।

राजकोषीय उपाय अब टिकाऊ नहीं : इन झटकों को झेलने के लिए अनिश्चितकाल तक सब्सिडी देने जैसे पारंपरिक राजकोषीय उपाय अब टिकाऊ नहीं हैं। इससे कंपनियों को वैश्विक उतार-चढ़ाव से बचाने के नाम पर संरचनात्मक सुधारों की रफ्तार सुस्त पड़ती है और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होती है। रिपोर्ट में तीन स्तंभों- संरचनात्मक करों में कमी, व्यापार नीति में संतुलन और आयात प्रबंधन पर आधारित रणनीति सुझाई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, उलट शुल्क ढांचे को खत्म करना, शुल्क दरों को परिस्थितियों के हिसाब से समायोजित करना और गैर-जरूरी लक्जरी आयात पर अंकुश लगाना जरूरी है।

क्या है स्थिति : वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का वस्तु आयात 774.98 अरब डॉलर रहा, जबकि निर्यात 441.78 अरब डॉलर रहा। इस तरह 333 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार घाटा पैदा हुआ।

सीमित करना जरूरी : रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने और रुपये को स्थिर रखने के लिए ऐसे आयात को सीमित करना जरूरी है, जिनका घरेलू उत्पादन पहले से उपलब्ध है या जिनमें मूल्य संवर्धन कम है। रिपोर्ट में सिगरेट, सिगार, तंबाकू उत्पाद और इनके विकल्पों जैसे हानिकारक उत्पादों के आयात का भी जिक्र किया गया, जिनका आयात 11.6 करोड़ डॉलर से अधिक रहा, जबकि भारत खुद इनका बड़ा उत्पादक है।इसके अलावा घड़ियों और लक्जरी कारों जैसी महंगी वस्तुओं की खरीद को टालना भी मौजूदा आर्थिक स्थिति में व्यावहारिक कदम हो सकता है। रिपोर्ट कहती है कि डंपिंग-रोधी अनुशंसाओं को खारिज करने की दर बढ़कर नवंबर-दिसंबर, 2025 में 81 प्रतिशत तक पहुंच गई है जबकि 1991-2020 के दौरान यह महज 0.5 प्रतिशत थी। इससे घरेलू उद्योगों को संरक्षण की नीति पर सवाल उठ रहे हैं।

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