बेंगलुरु में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीतारमण ने कहा कि बजट से पहले उद्योग संगठन और पेशेवर संस्थाएं सरकार के सामने अपनी मांगें रखती हैं। इनमें अक्सर तीन बातें प्रमुख होती हैं—कर की दर कम करना, किसी प्रावधान से छूट देना या रियायत मांगना।
वित्त मंत्री ने कहा कि वह इन मांगों की गंभीरता पर सवाल नहीं उठा रही हैं, क्योंकि हर क्षेत्र अपने कारोबार और करदाताओं के नजरिये से बात रखता है। लेकिन कर नीति पर चर्चा इससे आगे जानी चाहिए।
सीतारमण ने कहा कि अगर किसी कर प्रावधान से करदाताओं पर अतिरिक्त अनुपालन का बोझ पड़ रहा है तो उद्योग जगत को आंकड़ों के साथ बताना चाहिए कि इससे कितने लोग प्रभावित हो रहे हैं और कितना समय या खर्च बढ़ रहा है।
साथ ही किसी बदलाव का सुझाव देते समय यह भी बताना चाहिए कि उससे सरकारी राजस्व, कर व्यवस्था और दूसरे करदाताओं पर क्या असर पड़ेगा।
वित्त मंत्री ने कर व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल भी रखा। उनके मुताबिक चर्चा सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि किसी एक क्षेत्र को इस साल के बजट में क्या मिलेगा। सवाल यह होना चाहिए कि अगले दो दशकों के लिए भारत की कर व्यवस्था कैसी होनी चाहिए।
उन्होंने कर सुधारों के तहत कंपनी कर की दरों, व्यक्तिगत आयकर की दरों, बिना आमने-सामने की कर जांच और वस्तु एवं सेवा कर तथा सीमा शुल्क को तर्कसंगत बनाने जैसे कदमों का भी जिक्र किया।
अगले महीने से बजट पूर्व चर्चा शुरू होने की उम्मीद है। ऐसे में वित्त मंत्री का यह संदेश इस बार की बजट चर्चा को केवल राहत और छूट की मांग से आगे ले जाने का संकेत देता है।