ऑटो कंपोनेंट उद्योग में 98 हजार करोड़ रुपये का स्टॉक फंसा, 39 हजार करोड़ तक पूंजी मुक्त हो सकती है 
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ऑटो कंपोनेंट उद्योग में 98 हजार करोड़ रुपये का स्टॉक फंसा, 39 हजार करोड़ तक पूंजी मुक्त हो सकती है

ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में 98 हजार करोड़ स्टॉक में फंसे, खपत-आधारित प्रबंधन से 30-40% स्टॉक घटाने, 29-44 हजार करोड़ के अतिरिक्त मूल्य पूल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर

नई दिल्ली : भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग में करीब 98,000 करोड़ रुपये की पूंजी स्टॉक के रूप में फंसी हुई है। वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक, बेहतर स्टॉक प्रबंधन के जरिए इसमें से 29,000 से 39,000 करोड़ रुपये तक की राशि मुक्त की जा सकती है। इसका इस्तेमाल कार्यशील पूंजी के तौर पर किया जा सकेगा। इससे अकेले एमएसएमई क्षेत्र को 4,000 से 5,600 करोड़ रुपये का लाभ मिलने का अनुमान है।

80 प्रतिशत निर्माता हैं एमएसएमई

रिपोर्ट के अनुसार, देश के करीब 80 प्रतिशत ऑटो कंपोनेंट निर्माता एमएसएमई हैं। खपत-आधारित स्टॉक प्रबंधन अपनाने वाली कंपनियां अपने स्टॉक में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी कर सकती हैं। ऑटो कंपोनेंट एमएसएमई का कुल राजस्व करीब 2.4 से 2.9 लाख करोड़ रुपये है। उत्पादकता में 30 प्रतिशत सुधार से सालाना 74,000 से 88,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व पैदा हो सकता है। सामग्री लागत घटाने के बाद इससे 29,000 से 44,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मूल्य पूल बनने की संभावना है।

एमएसएमई नहीं कर रहे हैं पर्याप्त निवेश

अध्ययन में उद्योग की भविष्य की तैयारी को लेकर भी चिंता सामने आई है। 95 प्रतिशत उद्योग नेताओं का मानना है कि एमएसएमई भविष्य की वृद्धि के लिए पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे हैं। यह अध्ययन जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान 21 वरिष्ठ उद्योग अधिकारियों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है और इसे एसीएमए के 66वें वार्षिक सत्र में जारी किया गया।

क्षमता उपयोग औसतन 75 से 85 प्रतिशत होने के बावजूद 91 प्रतिशत प्रतिभागियों ने क्षमता को बड़ी चुनौती माना। बार-बार बदलाव, गुणवत्ता संबंधी नुकसान, दोबारा काम और कमजोर सामग्री प्रवाह प्रभावी उत्पादन क्षमता घटाते हैं।

वेक्टर के मैनेजिंग पार्टनर रविंद्र पटकी ने कहा कि चुनौती सिर्फ नई क्षमता जोड़ने की नहीं, बल्कि मौजूदा क्षमता को उत्पादक उत्पादन में बदलने की है। उनके अनुसार, परिचालन में फंसी नकदी मुक्त कर उसे तकनीक और क्षमता में लगाना जरूरी है। इससे भारतीय आपूर्तिकर्ताओं की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और वैश्विक सोर्सिंग में हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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