नई दिल्ली : भारत में कंपनियों के कामकाज में कृत्रिम मेधा (एआई) तकनीक के इस्तेमाल को लेकर निवेश तेजी से बढ़ रहा है। पिछले एक साल में एआई निवेश में 119 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो वैश्विक औसत 110 प्रतिशत से अधिक है। हालांकि, एआई के सुरक्षित और जवाबदेह इस्तेमाल के लिए जरूरी ढांचा तैयार करने में भारतीय संगठन अभी पीछे हैं। केवल 22 प्रतिशत संगठनों ने इसके लिए आवश्यक व्यवस्थाएं लागू की हैं।
सर्विसनाउ की ‘उद्यम एआई परिपक्वता सूचकांक 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, एआई में बढ़ते निवेश और ऑडिट, परीक्षण तथा जोखिम आकलन जैसी सुरक्षा व्यवस्थाओं के बीच अंतर बढ़ रहा है। भारतीय संगठनों के औसत आईटी बजट में एआई की हिस्सेदारी 2027 तक मौजूदा 16.6 प्रतिशत से बढ़कर 21.3 प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान है। अध्ययन में 4,500 वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया, जिनमें 350 भारत से थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 54 प्रतिशत संगठन एआई एजेंट का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन केवल 11 प्रतिशत ने ही बिना लगातार मानवीय हस्तक्षेप के एआई से काम पूरा कराने की व्यवस्था अपनाई है।
सर्विसनाउ के भारत एवं दक्षेस क्षेत्र के प्रबंध निदेशक एवं समूह उपाध्यक्ष कुलमीत बावा ने कहा कि बड़े पैमाने पर निवेश के बाद अगला चरण मजबूत नियमन, जवाबदेही, एकीकृत डेटा और ऐसी कार्यप्रणालियों पर निर्भर करेगा, जिनसे एआई को अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जा सकें।
एआई अपनाने में पारदर्शिता और गलत सूचना को 60 प्रतिशत प्रतिभागियों ने सबसे बड़ी चुनौती बताया। वहीं, 55 प्रतिशत ने नियामकीय एवं अनुपालन संबंधी जटिलताओं और 50 प्रतिशत ने डेटा निजता एवं सुरक्षा को प्रमुख चिंता माना।
बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण है। केवल 18 प्रतिशत भारतीय संगठनों ने पुरानी और अलग-अलग आईटी प्रणालियों को हटाकर एकीकृत मंच अपनाए हैं। इसके चलते एआई के सुरक्षित और जवाबदेह इस्तेमाल की तैयारी का भारत का स्कोर 100 में 55 रहा, जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अग्रणी संगठनों का स्कोर 78 है। इन संगठनों को एआई निवेश पर फिलहाल 149 प्रतिशत का प्रतिफल मिल रहा है।
डेलॉयट इंडिया के साझेदार एवं मुख्य रणनीति और नवाचार अधिकारी अश्विन वेल्लोडी ने कहा कि भारत में एआई परिपक्वता नए चरण में पहुंच रही है। बड़े पैमाने पर एआई अपनाने के लिए डेटा, प्रतिभा, संचालन और जवाबदेही जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं पर समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।