नई दिल्ली : भारतीय बैंकिंग इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश होने जा रहा है। कनाडा के उद्योगपति प्रेम वत्स की कंपनी फेयरफैक्स होल्डिंग्स करीब 53,000 करोड़ रुपये में IDBI बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी खरीदने जा रही है। वित्त मंत्रालय की उच्च स्तरीय बैठक में संशोधित बोली को मंजूरी मिल गई है। इस सौदे से सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 के 80,000 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है।
सरकार और फेयरफैक्स के बीच लंबे समय से चल रही बातचीत अब अंतिम चरण में पहुंच गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (EGoM) को भी संशोधित प्रस्ताव से अवगत करा दिया गया है। जल्द ही औपचारिक अधिसूचना जारी होगी और इसके बाद शेयर खरीद समझौते (SPA) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। फेयरफैक्स प्रवर्तक (Promoter) के रूप में हिस्सेदारी खरीदेगी, इसलिए उसे सार्वजनिक शेयरधारकों के लिए ओपन ऑफर भी लाना होगा।
नई डील के तहत केंद्र सरकार अपनी 45.48% हिस्सेदारी में से 30.48% हिस्सेदारी बेचकर करीब 26,620 करोड़ रुपये जुटा सकती है। वहीं, एलआईसी, जिसके पास बैंक में लगभग 49% हिस्सेदारी है, अपनी 30.24% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है।
यह सौदा भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश होगा। इससे पहले 2025 में एमिरेट्स NBD ने RBL बैंक में 60% हिस्सेदारी करीब 2.75 अरब डॉलर में खरीदी थी। IDBI बैंक का प्रस्तावित सौदा उस रिकॉर्ड से भी बड़ा माना जा रहा है।
फेयरफैक्स की भारतीय इकाई पहले से CSB बैंक में करीब 40% हिस्सेदारी रखती है। बैंकिंग नियमों के तहत कंपनी को CSB और IDBI बैंक के विलय की प्रक्रिया पूरी करनी होगी, जिसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अतिरिक्त समय दे सकता है। इसके अलावा, इस अधिग्रहण के लिए RBI की 'फिट एंड प्रॉपर' मंजूरी और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की स्वीकृति भी आवश्यक होगी।
सरकार ने चालू वित्त वर्ष में परिसंपत्ति मुद्रीकरण और विनिवेश से 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। अब तक करीब 20,272 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके हैं। IDBI बैंक में हिस्सेदारी बिक्री से मिलने वाले 26,620 करोड़ रुपये इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम साबित होंगे। इसके बाद सरकार कोल इंडिया और एलआईसी जैसी कंपनियों में भी हिस्सेदारी बिक्री पर आगे बढ़ सकती है।
IDBI बैंक का निजीकरण भारतीय बैंकिंग इतिहास की सबसे लंबी विनिवेश प्रक्रियाओं में से एक है। इसकी शुरुआत 21 जनवरी 2019 को हुई थी और अब करीब सात साल बाद यह सौदा अंतिम चरण में पहुंच गया है।