नयी दिल्ली/ पटना : उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की उस अर्जी पर सुनवाई 22 अप्रैल तक के लिए टाल दी, जिसमें देवघर कोषागार से जुड़े एक घोटाले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को झारखंड उच्च न्यायालय से मिली जमानत को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह कहते हुए मामले को टाल दिया कि दलीलें पूरी नहीं हुई हैं और कुछ आरोपियों की मौत हो चुकी है।
सुनवाई के दौरान, CBI ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने एक गैर-कानूनी आदेश पारित किया है और कानून का उल्लंघन करते हुए सजा निलंबित की गई है।
लालू की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि कुछ आरोपियों को नोटिस नहीं दिया गया है।
अदालत ने कहा, हम दोनों ही जानते हैं कि यह कैसी विशेष अनुमति याचिका है। हमें लगता है कि आप दोनों जानते हैं कि इसका नतीजा क्या होगा। हम सभी जानते हैं कि कानून का सवाल क्या है। लोग 60, 70 और 80 की उम्र के हैं।
पीठ ने कहा, फाइलें बस लटकी हुई हैं। हम अप्रैल में तारीख देंगे। जिन मामलों में प्रतिवादियों की मौत हो गई है, हम उन्हें बंद कर देंगे।
झारखंड उच्च न्यायालय ने पिछले साल जुलाई में यादव को सुनाई गई सजा की अवधि बढ़ाने के लिए सीबीआई की अपील विचारार्थ स्वीकार कर ली थी। यादव को देवघर कोषागार से जुड़े घोटाले में दोषी ठहराया गया था, जिसमें 89 लाख रुपये के कथित गबन का आरोप था।
विशेष सीबीआई अदालत ने यादव को इस मामले में दोषी ठहराया था और उन्हें 3.5 साल जेल की सजा सुनाई थी।
CBI ने आदेश के खिलाफ अपील करते हुए कहा कि यादव उस समय पशुधन विभाग का कामकाज देख रहे थे।
उसने कहा कि जांच में पता चला था कि उन्हें देवघर कोषागार में हुए गबन के बारे में पता था, फिर भी निचली अदालत ने इस जुर्म के लिए सिर्फ साढ़े तीन साल की सजा सुनाई, जिसमें अधिकतम सात साल की सजा हो सकती है। घोटाला सामने आने के समय झारखंड अविभाजित बिहार का हिस्सा था।