कोलकाता: स्वामी विवेकानंद के साथ-साथ श्रीरामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्यों में स्वामी अद्भुतानंद, जिन्हें श्रद्धापूर्वक लाटू महाराज कहा जाता है, एक अद्वितीय स्थान रखते हैं। परमहंस की 191वीं जयंती पर उनका स्मरण विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वे श्रीरामकृष्ण के एकमात्र हिंदी भाषी बिहारी शिष्य थे और सादगी, तप तथा निष्काम भक्ति के जीवंत प्रतीक बने।
बिहार के छपरा जिले में अत्यंत गरीब परिवार में जन्मे रक्तुराम उर्फ़ लाटू ने बचपन में माता-पिता खो दिए। जीवन की कठिनाइयों ने उन्हें कोलकाता पहुँचा दिया, जहाँ वे लेखक रामचंद्र दत्त के घर कार्य करने लगे। यहीं उनकी पहली भेंट श्रीरामकृष्ण परमहंस से हुई। गुरु ने इस सरल हृदय युवक में विलक्षण आध्यात्मिक क्षमता पहचानी और दक्षिणेश्वर में अपने पास रखा।
लाटू महाराज पढ़-लिख नहीं सकते थे, लेकिन साधना की ऊँचाइयों तक पहुँचना उन्होंने अद्भुत ढंग से किया। वे रात-रात भर ध्यान में लीन रहते। स्वामी विवेकानंद ने कहा—“लाटू श्रीरामकृष्ण का सबसे बड़ा चमत्कार है। अनपढ़ होते हुए भी उन्होंने गुरु के स्पर्श से सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त किया।”
रामकृष्ण उनके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते थे। लाटू महाराज ने अपने गुरु को जीवन से भी अधिक महत्व दिया। परमहंस के महाप्रयाण के बाद वे बारानगर मठ में संन्यास लेकर ‘स्वामी अद्भुतानंद’ कहलाए। जब रामकृष्ण मिशन और बेलूर मठ की स्थापना हुई, तब भी उनका मन एकांत साधना में ही रमित रहा।
उनकी विनम्रता का उदाहरण तब सामने आया, जब किसी भक्त ने उनके जीवन पर जीवनी लिखने की इच्छा जताई। लाटू महाराज ने इसे अस्वीकार कर कहा कि जीवनी श्रीरामकृष्ण परमहंस या स्वामी विवेकानंद पर लिखी जानी चाहिए। वे स्वयं किसी यश या प्रचार के लोभी नहीं थे।
24 अप्रैल 1920 को वाराणसी में गंगा तट पर ध्यानावस्था में उनका निधन हुआ। लाटू महाराज सिखाते हैं कि आध्यात्मिक महानता बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि समर्पण, तप और विनम्रता से आती है। बिहार की यह धरती ऐसे संत का स्मरण करती है, जहाँ ‘मैं’ का विलय ‘गुरु’ में होता है।