नयी दिल्ली : वरिष्ठ नेता मुकुल राय को बड़ी राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के विधायक के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने 13 नवंबर, 2025 को दलबदल विरोधी कानून के तहत राय को अयोग्य घोषित कर दिया था, क्योंकि वह 2021 के चुनावों में भाजपा के टिकट पर निर्वाचित होने के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने शुक्रवार को रॉय के बेटे सुभ्रांशु राय द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी करते हुए अंतरिम आदेश पारित किया। याचिका में उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी। पीठ ने निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय के फैसले का क्रियान्वयन स्थगित रखा जाए। सुभ्रांशु का प्रतिनिधित्व करने वाली वकील प्रीतिका द्विवेदी ने कहा कि वरिष्ठ नेता बीमार हैं और दावा किया कि उच्च न्यायालय ने अपनी सीमित न्यायिक समीक्षा शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक विधायक को अयोग्य घोषित करने का आदेश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने अयोग्यता की अर्जियों को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि मुकुल राय के कथित दलबदल को दर्शाने के लिए प्रस्तुत सोशल मीडिया पोस्ट साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत प्रमाणित नहीं थे।
उच्च न्यायालय ने अध्यक्ष के फैसले को पलटते हुए कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत कार्यवाही में धारा 65बी का सख्ती से पालन करना आवश्यक नहीं है। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने कहा कि मुकुल राय ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था और बाद में खुले तौर पर विपक्षी पार्टी में शामिल हो गए, जो दलबदल के समान है। उन्होंने मामले में दावा करने के कानूनी अधिकार (लोकस) का मुद्दा भी उठाया और राय के बेटे द्वारा याचिका दायर करने पर आपत्ति जताई। पीठ ने कहा, ‘‘अगर वह गंभीर स्थिति में हैं, तो परिवार का कोई सदस्य याचिका क्यों नहीं दायर कर सकता? उन्हें भी प्रतिवादी के रूप में जोड़ा गया है।’’ सीजेआई ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता साबित करनी होगी और उन्होंने कृत्रिम मेधा (एआई) द्वारा उत्पन्न वीडियो की मौजूदगी का हवाला दिया। अग्रवाल ने फैसले पर रोक लगाने का विरोध करते हुए कहा कि वह प्रथम दृष्टया यह साबित कर सकते हैं कि दलबदल हुआ था। पीठ ने विधानसभा का कार्यकाल कुछ ही महीनों में समाप्त होने का हवाला देते हुए फैसले पर रोक लगा दी। पीठ ने कहा, ‘‘यदि वह विधायक पद के लिए दोबारा चुनाव लड़ते हैं, तो आप एक आवेदन दें, हम देखेंगे कि क्या करना है।’’