कोलकाता : दीपावली केवल दीप जलाने और खुशियां मनाने का त्योहार नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की ओर बढ़ने का प्रतीक है। भारतीय सनातन संस्कृति में इस पर्व का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है। यह त्योहार लोगों को आपसी प्रेम, सद्भाव, सहयोग और भाईचारे का संदेश देता है। साथ ही, भगवान की भक्ति, पूजा-अर्चना और दीपदान के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
सनातन धर्म में वर्ष भर अनेक पर्व और त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन दीपावली का स्थान उनमें अत्यंत महत्वपूर्ण है। दीपावली शब्द का अर्थ दीपों की पंक्ति अथवा दीपों की माला है। इस अवसर पर घरों, मंदिरों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों को दीपों, घी के दीयों, तेल के दीपकों तथा मोमबत्तियों से सजाया जाता है। चारों ओर फैली रोशनी उत्सव के वातावरण को आनंदमय बना देती है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे दीपावली या दिवाली के नाम से जाना जाता है।
दीपावली से जुड़ी प्रमुख धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की कथा विशेष रूप से प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में लंका के राजा रावण का वध करने और चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद जब भगवान श्रीराम माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तब नगरवासियों ने उनके स्वागत में दीप जलाकर पूरे नगर को प्रकाश से जगमगा दिया।
अयोध्यावासियों ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के आगमन पर हर्षोल्लास के साथ उत्सव मनाया। नगर की गलियों और घरों को सजाया गया तथा विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन किए गए। इसी परंपरा को भगवान श्रीराम की विजय, धर्म की स्थापना और उनके अयोध्या आगमन की स्मृति में दीपोत्सव के रूप में देखा जाता है।
आज भी दीपावली के अवसर पर मंदिरों, घरों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, आकर्षक सजावट करते हैं और परिवार तथा मित्रों के साथ खुशियां साझा करते हैं। इस प्रकार यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को भी मजबूत करता है।
दीपावली से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध का है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसे पृथ्वी का पुत्र बताया गया है और ब्रह्मा तथा भगवान शिव से प्राप्त वरदानों के कारण वह अत्यधिक बलशाली हो गया था। अपनी शक्ति के अहंकार में उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया और विभिन्न लोकों में अत्याचार फैलाने लगा।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से नरकासुर का वध किया। नरकासुर के अंत के बाद उसकी माता पृथ्वी ने इस विजय की स्मृति में उत्सव मनाने की इच्छा व्यक्त की। इस प्रसंग को अधर्म पर धर्म की विजय और अत्याचार से मुक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
नरकासुर वध की कथा विशेष रूप से नरक चतुर्दशी से जुड़ी हुई है, जिसे कई क्षेत्रों में छोटी दीपावली भी कहा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में दीपावली से संबंधित धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में विविधता देखने को मिलती है। इन सभी कथाओं का मूल संदेश बुराई पर अच्छाई की विजय और जीवन में सदाचार की स्थापना है।
दीपावली का एक प्रमुख आकर्षण धन और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी की पूजा है। इस दिन श्रद्धालु अपने घरों और प्रतिष्ठानों में विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि स्वच्छ, सुव्यवस्थित और प्रकाश से सुसज्जित घर में मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है।
इसी कारण दीपावली से पहले घरों, दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की विशेष साफ-सफाई की जाती है। घरों के प्रवेश द्वार पर रंगोली बनाई जाती है, दीप जलाए जाते हैं और पूजा के दौरान परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा कल्याण की कामना की जाती है।
दीपावली की परंपरा लोगों को यह संदेश भी देती है कि समृद्धि का वास्तविक अर्थ केवल धन-संपत्ति अर्जित करना नहीं, बल्कि परिवार में सुख-शांति, समाज में सद्भाव और जीवन में नैतिक मूल्यों को बनाए रखना भी है।
वैष्णव परंपरा और श्रीकृष्ण भक्तों के लिए दीपावली का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में दामोदर लीला का महत्वपूर्ण स्थान है। इस लीला में माता यशोदा भगवान श्रीकृष्ण को रस्सी से बांधने का प्रयास करती हैं। इसी प्रसंग के कारण भगवान श्रीकृष्ण को 'दामोदर' नाम से भी जाना जाता है।
कार्तिक मास में इस लीला का विशेष स्मरण किया जाता है। अनेक वैष्णव मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में दीपदान, भजन-कीर्तन, कथा-पाठ और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है। श्रीकृष्ण भक्त इस अवधि में भगवान के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं।
वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कॉन) के मंदिरों सहित अनेक वैष्णव धार्मिक केंद्रों में कार्तिक मास के दौरान विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन, दामोदराष्टक का पाठ, भजन-कीर्तन और दीपदान प्रमुख रूप से शामिल होते हैं।
इस परंपरा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि लोगों को भगवान की भक्ति, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जीवन के महत्व से जोड़ना भी है।
सनातन धर्म में कार्तिक मास को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। पद्मपुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में कार्तिक मास के दौरान भगवान विष्णु की आराधना और दीपदान की महिमा का वर्णन मिलता है। श्रद्धालु इस महीने में मंदिरों, तुलसी के समीप, घरों और कई स्थानों पर खुले आकाश के नीचे दीप जलाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास में नियमित रूप से दीपदान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान हरि की कृपा प्राप्त होती है। अनेक भक्त पूरे महीने व्रत, पूजा, जप, भजन और सेवा जैसे धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं।
कार्तिक मास की इन परंपराओं का आध्यात्मिक उद्देश्य मन को शुद्ध करना, ईश्वर के प्रति समर्पण बढ़ाना और जीवन में सदाचार को अपनाना है। दीपक की लौ को ज्ञान, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इस दृष्टि से दीपदान व्यक्ति को अपने भीतर के अज्ञान और नकारात्मक विचारों को दूर करने की प्रेरणा देता है।
दीपावली का महत्व धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व समाज में प्रेम, सहयोग और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और पुराने मतभेदों को भुलाकर संबंधों में मधुरता लाने का प्रयास करते हैं।
इस अवसर पर जरूरतमंद लोगों की सहायता करना, गरीब परिवारों के साथ खुशियां साझा करना और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता दिखाना भी दीपावली की भावना के अनुरूप है। बच्चों और युवाओं को भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं तथा नैतिक मूल्यों से परिचित कराने में भी यह पर्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दीपावली के दौरान आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम, धार्मिक प्रवचन, भजन-कीर्तन और सामूहिक आयोजन समाज को अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं। इन गतिविधियों के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होता है और नई पीढ़ी को अपनी सभ्यता के मूल्यों को समझने का अवसर मिलता है।
दीपावली हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, आशा और सकारात्मकता का दीपक सदैव जलाए रखना चाहिए। यह पर्व सत्य, धर्म, करुणा, सेवा और सदाचार जैसे मूल्यों को अपनाने का संदेश देता है।
यदि दीपावली को स्वच्छता, संयम, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और सामाजिक सेवा के साथ मनाया जाए, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मिट्टी के दीपक जलाना, जरूरतमंदों की सहायता करना, अनावश्यक शोर से बचना और परिवार तथा समाज के साथ प्रेमपूर्वक समय बिताना इस पर्व की भावना को सार्थक बना सकता है।