नव बंगाल के सृजन दिवस का आरंभ चित्र इंटरनेट से साभार
बंगाल

'नव बंगाल के सृजन दिवस' का आरंभ

पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक रूप से सत्ता परिवर्तन हुआ है। इस परिवर्तन को एक नये युग के आरंभ के रूप में देखा जा रहा है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपने अथक प्रयासों की बदौलत भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस के पन्द्रह वर्षों के शासन को राज्य के राजनैतिक धरातल से उखाड़ फेंका। इसलिए यह बदलाव ऐतिहासिक है।

शनिवार को कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड पर पश्चिम बंगाल में नयी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह होगा। यह भी एक संयोग है कि इस दिन यानी 9 मई को कवि गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर की जयंती भी है जिनके गीतों के बिना बंगाल का कोई सांस्कृतिक साहित्यिक आयोजन पूर्ण नहीं होता, जिनका लेखन और जीवन दर्शन न सिर्फ बंगाल बल्कि देश और दुनिया के लिए प्रेरणापुंज है। नव जागरण की इस पुनीत वेला में नयी सरकार के शपथ ग्रहण का आयोजन इस महान दार्शनिक के जीवन दर्शन की ओर दृष्टिपात करने की भी प्रेरणा देता है ।

कवि और दार्शनिक

कवीन्द्र रवींद्रनाथ टैगोर का साहित्यिक जीवन काव्य प्रतिभा और दार्शनिक चिंतन का एक अद्भुत संगम था। वे भाषा के ऐसे शिल्पकार थे, जिन्होंने बांग्ला कविता को एक जीवंत और अभिव्यंजक रूप दिया । उन्होंने पारंपरिक ढाँचों को चुनौती भी दी, बोलचाल की बांग्ला भाषा को शास्त्रीय बिम्बों के साथ पिरोते हुए एक ऐसा सृजन किया जो सबके दिलों को छू गई । उनकी कविताएँ, विशेषरूप से " गीतांजलि ", प्रकृति की सुंदरता, प्रेम और विरह की जटिलताओं और ईश्वर के प्रति गहरी उत्कंठा को बहुत ही सरलता से व्यक्त करती हैं । यहां यह उल्लेखनीय है कि स्वयं टैगोर द्वारा अनूदित यह उत्कृष्ट कृति पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु बनी, जिसके लिए उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला ।

साहित्यिक कृतियों में सामाजिक विषयों को समाहित किया

टैगोर की साहित्यिक रचनाएँ दर्शन के क्षेत्र में भी प्रवेश कर गईं, जहाँ उन्होंने सामाजिक बंधनों पर सवाल उठाए और व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन किया। उनका मानना था कि मानवता सार्वभौमिक है और सांस्कृतिक सीमाओं से परे है। उनके उपन्यासों, निबंधों और नाटकों में प्रेम और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को समाहित किया गया है। "घरे-बाइरे" में परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष को दर्शाया गया है, जबकि "चित्रा" में प्राचीन मिथकों की पुनर्व्याख्या करते हुए नारी सशक्तीकरण के विषयों को प्रस्तुत किया गया है।

टैगोर का दर्शन भारत की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत से गहराई से प्रेरित था। वे एक समग्र शिक्षा में विश्वास रखते थे जो बुद्धि और आत्मा दोनों का पोषण करे, और इसी दर्शन को उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना में साकार किया। अपने लेखन के माध्यम से, टैगोर एक पुनरुत्थान की ओर अग्रसर हो रहे समृद्ध परम्पराओं वाले भारत की आवाज बने।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में रवींद्रनाथ टैगोर का योगदान अद्वितीय और बहुआयामी था । यद्यपि वे सक्रिय राजनीतिक नेता नहीं थे, फिर भी उन्होंने अपने शब्दों और कार्यों से अपार शक्ति का प्रदर्शन किया । उन्होंने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के पुनरुद्धार का समर्थन किया और आत्मनिर्भरता एवं आर्थिक सशक्तीकरण के महत्व पर बल दिया। उनके लेखन ने, विशेष रूप से "जन गण मन" (जिसे बाद में भारत का राष्ट्रगान बनाया गया) गीत के माध्यम से, राष्ट्रीय गौरव की भावना को जागृत किया।

ब्रिटिश अन्याय का पुरजोर विरोध

टैगोर ब्रिटिश अन्याय का सामना करने से नहीं डरते थे। उन्होंने 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड का पुरजोर विरोध किया। उनका मानना था कि स्वशासन प्राप्त करने के लिए शिक्षा ही कुंजी है। उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक अद्वितीय संस्थान था। शिक्षा पर इस जोर ने भारतीयों को ब्रिटिश प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल से सशक्त बनाया।

टैगोर ने स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन उनका मानना था कि सच्ची स्वतंत्रता के लिए नैतिक और आध्यात्मिक जागृति आवश्यक है। सांस्कृतिक पुनरुत्थान, प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शनों और शैक्षिक पहलों के माध्यम से रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर अमिट छाप छोड़ी। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि मुक्ति का संघर्ष अनेक मोर्चों पर लड़ा जा सकता है, जिसमें शब्दों और विचारों की शक्ति राजनीतिक कार्रवाई के साथ-साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

नाइटहुड का त्याग : 1919 में, जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारत को झकझोर दिया। ब्रिटिश सैनिकों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर गोलियां चलाईं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। इसके जवाब में, ब्रिटिश राजघराने द्वारा प्रतिष्ठित नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित टैगोर ने एक सशक्त सार्वजनिक बयान में अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। अवज्ञा के इस कार्य ने भारतीयों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी, जो ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते आक्रोश और न्याय के प्रति टैगोर की अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था।

"जन गण मन" : टैगोर की कृति, जन गण मन, जो मूल रूप से 1911 में लिखी गई थी। यह मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया था। इसका मूल शीर्षक भारतो भाग्य विधाता था। इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया था। राष्ट्रगान संस्करण हिंदी अनुवाद है। संविधान सभा ने इसके हिंदी संस्करण को 24 जनवरी 1950 को आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया।

9 मई कवि गुरु की जयंती है, और इसी दिन बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की शासन की भी प्रथम जयंती है। इस पुनीत अवसर पर सूर्य कांत त्रिपाठी 'निराला' की प्रसिद्ध कविता की कुछ प्रेरक पंक्तियां प्रासंगिक हैं -

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव,

नवल कंठ, नव जलद-मंद रव;

नव नभ के नव विहग-वृंद को,

नव पर, नव स्वर दे !...

आइए इस शुभ वेला में 'नव बंगाल के सृजन दिवस' पर शुभ कर्मों का संकल्प लें।

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