माता दुर्गा की प्रतिमा जिनमें सब मिलाकर कुल 22 गुड़िया मूर्तियां हैं  
आसनसोल

इस्लामपुर में होती है माता दुर्गा सहित 22 गुड़िया देवी - देवताओं की पूजा

बैस पुतुल समुदाय व जमींदार परिवार ने शुरू की थी यह पूजा

Vijay Shankar

मुर्शिदाबाद : 22 गुड़िया की मूर्तियों को 22 तरह का प्रसाद चढ़ाया जाता है! इसके बाद उनके विसर्जन की भी एक खास परंपरा है। अगर दशमी के दिन दो बहनें नदी के बीच में मिलती हैं, तो विसर्जन किया जाता है! पुराने समय के अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हुए मुर्शिदाबाद की 22 गुड़िया दुर्गा पूजा आज भी इसी तरीके से की जाती है। कोई कहता है तीन सौ वर्ष, कोई कहता है साढ़े तीन सौ पुरानी है यह पूजा। हर साल दूर-दराज से हजारों भक्त इस पूजा को देखने के लिए आते हैं। दोचाला की 22 गुड़िया दुर्गापूजा सदियों से इस्लामपुर की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। दुर्गापूजा इस्लामपुर में भैरव नदी के किनारे स्थित 22 गुड़िया यूनिवर्सल दुर्गा मंदिर में की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस्लामपुर में इस पूजा की शुरुआत बैस पुतुल समुदाय और रॉय इलाके के ज़मींदार परिवार की मदद से हुई थी। 17वीं सदी में किसी समय, जब शाद गोस्वामी पानी के रास्ते नवद्वीप से जेसोर जा रहे थे, तो आराम के लिए कस्बा गोयस परगना में बैस पुतुल मठ में रुके थे। उस समय गोयस एक परगना शहर था और इस्लामपुर एक छोटा-सा गांव था। मठ को रामदास स्वामी चलाते थे। उस समय शाद गोस्वामी समेत कुल 22 वैष्णवों का स्वागत 22 कटोरों में भोग लगाकर किया गया था। वहीं से 22 भोग का प्रचलन शुरू हुआ। प्रचलित मान्यता के अनुसार, उस समय पूरे परगना में एक भयानक महामारी फैल गई थी। महामारी से बचने के लिए परगने के लोगों ने भैरव नदी के किनारे इस्लामपुर में एक बस्ती बसाई। बैस भोग की परंपरा को बनाए रखने के लिए, तब इस्लामपुर में 22 गुड़ियों की एक दुर्गा की स्थापना की गई थी। बाईस कठपुतली दुर्गा की छोटी बहन बुड़ी मा की पूजा करीब चार मील दूर एक चौक पर होती है। स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि बाईस कठपुतली वाली दुर्गा और चौक वाली दादी दो बहनें हैं। बाईस कठपुतली वाली दुर्गा बुड़ी मा की बहन है। हर साल बुड़ी मा अपनी बहन से मिलने पैदल आती थी। इसी मान्यता के अनुसार जब भैरव में पानी होता था, तो बुड़ी मा नाव से आती थीं और उसके बाद ही बाईस कठपुतली का विसर्जन किया जाता था। विसर्जन देखने के लिए हजारों लोग भैरव नदी के दोनों किनारों पर जमा होते थे। ज्ञात हो कि दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर में दुर्गा, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, नंदी-भृंगी, गोरुड़ पक्षी समेत बाईस मूर्तियों की एक साथ पूजा की जाती है। बाईस गुड़ियों में दुर्गा और उनकी दो बेटियां लक्ष्मी और सरस्वती एक रथ में रहती हैं। कार्तिक और गणेश रथ के बाहर रहते हैं। दुर्गा की सहेलियां जया और विजया उनके बगल में रहती हैं। और शिव दुर्गा के सिर ऊपर रहते हैं। नंदी-भृंगी और बाकी देवी-देवता उस एक रथ में रहते हैं। 22 गुड़िया पूजा कमेटी के महासचिव कर्मकार ने कहा, पूजा की इस परंपरा ने इस पूजा को एक अलग पहचान दी है। 

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