जामुड़िया : दीपावली का पर्व आते ही घर-आंगन में दीपों की जगमगाहट और मां लक्ष्मी की आराधना का माहौल बनने लगता है। इस पर्व के साथ अनेक पारंपरिक रीति-रिवाज जुड़े हैं। इन्हीं में बच्चों द्वारा मिट्टी से घरौंदा बनाने की परंपरा भी शामिल है। हालांकि, बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव से अब मिट्टी के घरौंदों की जगह थर्माकोल से बने घरौंदे लेते जा रहे हैं।
एक समय था, जब दुर्गोत्सव के बाद ही बच्चों में दीपावली की तैयारियों को लेकर उत्साह बढ़ जाता था। बच्चे मिट्टी एकत्रित कर अपने घरों के आसपास मिल-जुलकर घरौंदे बनाते थे। इसके बाद रंगों, फूलों और सजावटी सामग्रियों से उन्हें आकर्षक रूप देते थे। किसका घरौंदा सबसे सुंदर होगा, इसे लेकर बच्चों में खास उत्सुकता रहती थी। यह गतिविधि उनके आपसी मेलजोल, रचनात्मकता और पारिवारिक सहभागिता का माध्यम भी थी।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घरौंदा नए घर, सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। दीपावली के दिन बच्चे अपने घरौंदे को सजाकर मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इसमें धन की मुड़की, गुड़ की झिल्ली और अन्य पारंपरिक मिठाइयां रखी जाती हैं। पूजा के बाद प्रसाद बांटकर खाने की परंपरा भी रही है। इससे बच्चों को धार्मिक आस्था, आपसी प्रेम और मिल-बांटकर खुशियां मनाने की सीख मिलती थी।
समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया है। अब कई बच्चे थर्माकोल से घरौंदे बनाते हैं, जबकि कुछ बाजार से तैयार घरौंदे खरीदकर पूजा करते हैं। इसी तरह मिट्टी के दीयों के साथ बिजली की रंग-बिरंगी झालरों का इस्तेमाल भी बढ़ा है।
आधुनिक सजावट ने दीपावली को भले ही आकर्षक बनाया हो, लेकिन अपने हाथों से मिट्टी के घरौंदे बनाने का आनंद अलग था। जरूरत है कि नई पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़कर रखा जाए, ताकि दीपावली रोशनी के साथ भारतीय संस्कृति, पारिवारिक संस्कार और धार्मिक आस्था का पर्व भी बनी रहे।