कन्या संतान की कामना से शुरू हुई पूजा 72 साल बाद भी कायम है परंपरा
—डोबराना के पात्रबाड़ी में आज भी पूर्वजों की रीति से होती है मां दुर्गा की आराधना
फोटो : पात्रबाड़ी की दुर्गापूजा
जामुड़िया : कन्या संतान की कामना से करीब 72 वर्ष पहले शुरू हुई दुर्गापूजा आज भी डोबराना गांव के पात्रबाड़ी में उसी आस्था और परंपरा के साथ जारी है। समय के साथ घर का स्वरूप बदला, कच्चे मकान की जगह पक्की छत बन गई, लेकिन पूजा की विधि और उससे जुड़ी पारिवारिक मान्यताओं में कोई बदलाव नहीं आया।
पात्र परिवार के सदस्यों के अनुसार, करीब 72 वर्ष पहले परिवार के पूर्वज स्वर्गीय वाराणसी पात्र ने इस दुर्गापूजा की शुरुआत की थी। उस समय परिवार में कोई कन्या संतान नहीं थी। कन्या संतान की कामना से उन्होंने अपने स्तर पर मां दुर्गा की आराधना शुरू की। परिवार का मानना है कि पूजा शुरू होने के बाद वंश में पहली कन्या संतान का जन्म हुआ। इसके बाद यह पूजा परिवार की आस्था और परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन गई।
पूजा की शुरुआत के समय मंदिर टीन की छत वाले मिट्टी के घर में था। वर्तमान में वहां पक्की छत है, लेकिन पूजा की पुरानी रीति आज भी कायम है। पात्र परिवार की सदस्य पौलमी पात्र ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वजों से इस पूजा का इतिहास सुना है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह परंपरा आगे बढ़ रही है।
परिवार के अनुसार, जीताष्टमी के अगले दिन मंदिर में घट स्थापित कर पान-सुपारी के माध्यम से मां दुर्गा को मायके आने का निमंत्रण दिया जाता है। महालया के बाद षष्ठी से नवमी तक परिवार के सदस्य सात्विक भोजन करते हैं। षष्ठी को विवाहित दंपती के माध्यम से मां का अधिवास कराया जाता है। मिट्टी के बर्तन में हविष्य भोजन तैयार कर ग्रहण करने की भी परंपरा है। सप्तमी से मुख्य पूजा शुरू होती है।
अष्टमी को दूध और गुड़ से तैयार विशेष मिठाई की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। दशमी को मां को ‘मछली की यात्रा’ कराकर विदाई दी जाती है।
गोपीनाथ पात्र, अर्क पात्र और माधव पात्र ने बताया कि पूजा पारिवारिक होने के बावजूद ग्रामीण भी इसमें उत्साह से शामिल होते हैं। आने वाली पीढ़ियों तक इस परंपरा को कायम रखने का प्रयास जारी रहेगा।