संजय, सन्मार्ग संवाददाता
बर्दवान : बंगाली समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार दुर्गा पूजा अब केवल पंडालों तक सीमित नहीं है। इस बार पूजा की भावना पूर्व बर्दवान के काटवा महकमे के घोरनाश गांव में हाथों से बुनी विशेष साड़ियों पर भी देखने को मिल रही है। प्योर शहतूत (मलबेरी) सिल्क पर हाथ से बुनी जा रही इस साड़ी पर मां दुर्गा की आकृति के साथ-साथ सिंह और कमल के फूलों की नक्काशी भी की जा रही है। पारंपरिक हथकरघा शिल्प और आधुनिक सोच के मेल से तैयार हो रही यह अनोखी साड़ी ''रिलायंस स्वदेश'' के ऑर्डर पर बनाई जा रही है। एक साड़ी को पूरा तैयार करने में लगभग डेढ़ से दो महीने का समय लग रहा है और फिलहाल ऐसी 50 से 100 साड़ियों को तैयार करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। व्यापारी और बुनकर राघवेंद्र सुंदर दास ने बताया, “पहले हम इसे बारीक खादी के धागों से बनाते थे। लेकिन इस साल हम इसे प्योर मलबेरी सिल्क पर बना रहे हैं। साड़ी की लंबाई साढ़े छह मीटर है, जिसमें ब्लाउज पीस भी शामिल है। यह पूरी तरह से हस्तनिर्मित है और एक साड़ी को बुनने में डेढ़ से दो महीने लग रहे हैं।” दुर्गा पूजा से ठीक पहले इस तरह की विशेष साड़ी बनाने का मौका मिलने से घोरानाश के बुनकर बेहद खुश हैं। इस बारीक डिजाइन को उकेरने के लिए कारीगरों को रोजाना लगभग 8 से 10 घंटे करघे पर बैठकर कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है, जिससे आंखों पर भी काफी दबाव पड़ता है। इस मेहनत के बदले बुनकरों को एक साड़ी की बुनाई मजदूरी के रूप में लगभग 50 हजार रुपये मिल रहे हैं। घोरानाश गांव के कई बुनकर सालों से जामदानी साड़ियां बनाने का काम कर रहे हैं। उन्हीं में से कुछ चुनिंदा करघों पर अब मां दुर्गा की आकृति उकेरने का काम चल रहा है। बुनकर वरुण कुमार पाल ने कहा, “मुझे बहुत खुशी हो रही है। इससे पहले मैंने श्रीकृष्ण थीम पर आधारित साड़ी बुनी थी, लेकिन मां दुर्गा के इस तरह के डिजाइन की साड़ी पहली बार बुन रहा हूं।”