मां दुर्गा की अनूठी प्रतिमा 
आसनसोल

दीपावली पर मां काली की नहीं, यहां होती है मां दुर्गा की आराधना

202 साल पुरानी है यह अनोखी परंपरा

Sanjay Singh

संजय सन्मार्ग संवाददाता बांकुड़ा: देश भर में जहां दीपावली की रोशनी और मां काली की आराधना का उल्लास है, वहीं पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले की मंदिर नगरी विष्णुपुर में एक बेहद अनूठी परंपरा जीवंत है। यहां के पात्रापाड़ा स्थित रक्षित परिवार में दीपावली की अमावस्या पर पारंपरिक मां काली की जगह देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। करीब 202 साल पुरानी इस परंपरा को 'अकाल बोधन' का एक अनूठा उदाहरण माना जाता है।

रक्षित परिवार में देवी दुर्गा किसी असुरमर्दिनी या सिंहवाहिनी रूप में नहीं, बल्कि घर की अपनी बेटी 'उमा' के रूप में पूजी जाती हैं। उनके साथ भगवान शिव, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश की मूर्तियां भी स्थापित होती हैं। शारदीय नवरात्र की तरह ही यहां चार दिनों तक पूर्ण निष्ठा और नियमों के साथ अनुष्ठान होते हैं। परंपरा के तहत, पूजा के पहले दिन आज भी 'चालकुम्भो बलि' (कद्दू की बलि) की प्रथा निभाई जाती है।

स्वप्नादेश से शुरू हुई थी परंपरा

परिवार के मुताबिक, इस अनूठी पूजा की शुरुआत लगभग दो सौ साल पहले एक अलौकिक स्वप्नादेश से हुई थी। उनके एक पूर्वज पुरुलिया के जंगल में तसर इकट्ठा करने गए थे, जहां एक पेड़ के नीचे सोते समय उन्हें मां दुर्गा ने दर्शन दिए और विष्णुपुर स्थित घर में उनकी स्थापना का आदेश दिया। घर लौटने पर जब उन्होंने इसका जिक्र किया, तो परिजनों को वैसी ही पूर्ण मूर्तियां प्राप्त हुईं। तब से यह व्यतिक्रमी दुर्गापूजा हर साल दीपावली पर होती आ रही है।

भाई दूज के बाद होती है विदाई

इस उत्सव की सबसे खास बात इसकी विदाई है। चूंकि मां उमा परिवार की बेटी हैं, इसलिए उनकी विदाई आम दिनों में न होकर 'भाई फोटा' (भाई दूज) के ठीक बाद होती है। परिवार का मानना है कि जैसे बेटियां त्योहार के बाद ससुराल लौटती हैं, वैसे ही मां उमा भी विदा होती हैं। जब तक घट विसर्जन नहीं होता, परिवार का कोई सदस्य विष्णुपुर नहीं छोड़ता। दीपावली के ये दिन रक्षित परिवार के लिए एक बड़े मिलन-उत्सव में बदल जाते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा सिर्फ एक पारिवारिक पूजा नहीं, बल्कि विष्णुपुर के इतिहास, आस्था और संस्कृति का एक अनूठा जीवंत दस्तावेज है।

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