मां को पूजते पुरोहित 
आसनसोल

जहां कैदियों के हाथों गूंथे फूलों से सजती हैं मां छिन्नमष्तिका

53 साल से अटूट है कैदियों और देवी की आस्था का यह रिश्ता

Sanjay Singh

संजय सन्मार्ग संवाददाता बांकुड़ा: मंदिरों की नगरी विष्णुपुर में स्थित मां छिन्नमष्तिका काली मंदिर की एक बेहद अनोखी और प्रेरणादायक परंपरा पिछले 53 वर्षों से चली आ रही है। इस जागृत मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां साल के 365 दिन रोजाना कैदियों के हाथों गूंथी गई फूलों की माला से ही देवी की नित्य पूजा होती है। अन्य काली मंदिरों की तरह यहां देवी की प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता, बल्कि मां पूरे साल गर्भगृह में ही विराजमान रहती हैं।

मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना के पीछे एक अलौकिक स्वप्न का इतिहास है। वर्ष 1973 में मिदनापुर के रहने वाले और मौनी बाबा के शिष्य कृष्णचरण गुइन को दोपहर के समय एक सपना आया था। कहा जाता है कि सपने में बामाखेपा और भैरवी माता ने उन्हें इस स्थान पर मां छिन्नमस्ता की स्थापना कर पूजा-पाठ शुरू करने का आदेश दिया था। इसी निर्देश के बाद 1973 में विष्णुपुर के दलमादल इलाके में मंदिर की स्थापना हुई और तभी से कैदियों द्वारा माला भेजने की यह अनूठी परंपरा शुरू हो गई।

जेल की सलाखों के पीछे गूंथी जाती है आस्था की माला

विष्णुपुर उप-कारागार (सब-करेक्शनल होम) के कैदी इस परंपरा का अहम हिस्सा हैं। जेल के अंदर ही कैदियों ने विभिन्न फूलों के पौधे लगाए हैं, जिनकी वे खुद देखभाल करते हैं। रोजाना सुबह स्नान के बाद कैदी जेल के बगीचे से फूल चुनते हैं और अपने हाथों से सुंदर माला तैयार करते हैं। इसके बाद ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के जरिए यह माला मंदिर के पुजारी तक पहुंचाई जाती है।

मंदिर के मुख्य पुजारी अरुणांशु गोस्वामी बताते हैं, 'माता तो सबकी हैं। जेल के अंदर बंद कैदी भी पूरी भक्ति के साथ मां के लिए फूल चुनते हैं और माला गूंथते हैं।' खास बात यह है कि जेल में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के कैदी आपसी सद्भाव के साथ मिलकर मां की माला तैयार करते हैं। कई कैदी जेल से रिहाई की मन्नत मांगते हैं और रिहा होने के बाद यहां आकर अपनी मन्नत पूरी भी करते हैं।

दीपावली पर उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़

समय के साथ इस मंदिर की महिमा पूरे राज्य में फैल चुकी है। यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन दीपावली (दीपान्विता अमावस्या) के अवसर पर मंदिर का नजारा देखने लायक होता है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना के साथ गर्भगृह में हवन-यज्ञ भी किया जाता है। शाम की आरती और विशेष दर्शन के लिए सुबह से ही हजारों भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है, जिससे पूरा मंदिर परिसर मां के जयकारे से गूंज उठता है।

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