गज पर सवार मां लक्ष्मी 
आसनसोल

जब हाथियों के डर ने जन्म दी 128 साल पुरानी परंपरा

जानिए बांकुड़ा की अनोखी 'गजलक्ष्मी' पूजा

Sanjay Singh

संजय सन्मार्ग संवाददाता

बांकुड़ा: दलमा के जंगलों से आने वाले हाथियों के उत्पात और जान-माल के नुकसान से फसलों की रक्षा के लिए बेलियातोड़ थाना अंतर्गत रामकानाली गांव में शुरू हुई ‘गजलक्ष्मी पूजा’ आज भी अपनी पूरी भव्यता के साथ जीवित है। करीब 128 वर्ष पहले ग्रामीणों द्वारा शुरू की गई यह अनूठी परंपरा आस्था और लोक-संस्कृति का प्रतीक बन चुकी है। कोजागरी पूर्णिमा के पावन पर्व पर आयोजित होने वाले इस चार दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान में केवल रामकानाली ही नहीं, बल्कि आसपास के 15 से 20 गांवों के श्रद्धालु मत्था टेकने पहुंचते है।

गजराज पर सवार है मां लक्ष्मी का दुर्लभ स्वरूप

इस पूजा का मुख्य आकर्षण देवी लक्ष्मी की अनूठी प्रतिमा है। आमतौर पर कमल के पुष्प पर विराजने वाली मां लक्ष्मी यहां 'गज' यानी हाथी की पीठ पर आसीन हैं। एकचाला (एक ही ढांचे) में गढ़ी गई इस दिव्य प्रतिमा में देवी के दोनों ओर सखियां और सिरों पर दो मोर सुशोभित हैं।

ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि हाथियों के लगातार हमलों के बीच उनके गांव और फसलों की सुरक्षा देवी की कृपा से ही संभव हो पाती है।

क्या कहते हैं ग्रामीण

गांव के गौतम बाड़ी ने बताया, "हमारे पूर्वजों ने हाथियों के खौफ से निजात पाने के लिए यह पूजा शुरू की थी, जो सवा सौ साल बाद भी उसी निष्ठा से जारी है।" वहीं, दिनेश सीट और भैरव सीट ने कहा कि यह दुर्लभ स्वरूप पूरे क्षेत्र की आस्था का केंद्र है और उत्सव के चार दिन गांव में रिश्तेदारों व श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

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