विवाह में उम्र का अंतर अब मायने नहीं रखता विवाह में उम्र का अंतर अब मायने नहीं रखता
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विवाह में उम्र का अंतर अब मायने नहीं रखता

दाम्पत्य जीवन

आज के युग में शादी-ब्याह के स्वरूप में काफी परिवर्तन आया है। विवाह से संबंधित जाने कितनी मान्यताएं हैं जो खारिज हो चुकी हैं। इन्हीं में से एक है वर-वधू की उम्र का अंतर - विवाह के मामले में ‘उम्र’ अब गैर महत्वपूर्ण कारक बनती जा रही है। उचित चुनाव की दृष्टि से अपेक्षाएं इतनी बढ़ गई हैं कि उम्र में थोड़ा बहुत समझौता गौण हो गया है। किसी ने अगर बड़ी उम्र की लड़की से शादी कर भी ली है तो अब यह साहसी निर्णय नहीं माना जाता।

आज लड़का लड़की दोनों कैरियर माइंडेड होते जा रहे हैं। कैरियर में एक मुकाम हासिल करने के लिए उम्र का बड़ा हिस्सा कैरियर के नाम करना पड़ता है। इसके अलावा बहुत सा समय पर्सनैलिटी इम्प्रूवमेंट के लिए खर्च किया जाता है यानी उम्र का शुरुआती हिस्सा तो इन दो उद्देश्यों की भेंट चढ़ जाता है। इसके बाद भी उम्र में बड़े दूल्हे या छोटी दुल्हन की रट पकड़े रहे तो कुंवारे रहने की ही नौबत आ सकती है।

विवाह में उम्र के अंतर पर ध्यान न देने के कई कारण हो सकते हैं परंतु इन सबका आधार मनोविज्ञान में परिवर्तन ही है। जन जीवन में बहुत सी वर्जनाएं अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं चाहे इन्हें परिस्थितियों की मांग कहें या विवाह संस्था पर से उठता विश्वास या बोल्डनेस।

यूं भी आज की आत्मनिर्भर और सशक्त मानसिकता वाली स्त्री को पति के रूप में उस संरक्षक की आवश्यकता नहीं रह गई है जैसी प्राचीन संदर्भों में हुआ करती थी। सही अर्थों में उन्हें एक साथी की आवश्यकता है इसलिए पति का उम्र में छोटा होना कोई मायने नहीं रखता।

एक अनोखा तथ्य यह भी है कि सौंदर्य और सौष्ठव के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण स्त्रियां उम्र को अंगूठा दिखाने में समर्थ हैं। आज महिलाएं अपने लुक्स और अपनी हेल्थ को लेकर भी काफी कॉन्शियस हो गई हैं। कभी-कभी तो ऐसा देखने में आता है कि तीस-पैंतीस की स्त्री की कमनीय काया तरुणियों को भी लजा दे। क्या आश्चर्य इसी आकर्षण के चलते 26-27 वर्षीय कोई युवक किसी 30-35 वर्ष की युवती से प्रेम कर बैठे।

विभिन्न कारणों से विवाह की प्रारंभिक अवस्था गंवा चुकी महिलाओं के लिए सुयोग्य लड़कों की कमी हो जाती है इसलिए भी वे कम उम्र के युवक से शादी का निर्णय ले लेती हैं।

उम्र बढ़ने के साथ-साथ स्वभाव में परिपक्वता आने लगती है। कम उम्र की लड़कियों के स्वभाव में जहां अस्थिरता और चंचलता होती है वहीं बड़ी उम्र की स्त्रियों में गंभीरता और स्थायित्व होता है। वे जीवन के प्रति एक निश्चित और संतुलित दृष्टिकोण रखती हैं। आकांक्षाओं की सीमा वे जानती हैं, इसलिए कई समस्याओं से सफलतापूर्वक निपट पाती हैं। उनका यह गुण युवकों को आकर्षित करता है।

आज की आपा धापी और यांत्रिक जीवन शैली में पुरुषों के पास समय की भारी कमी है। नौकरी में देश विदेश भागते रहने वाले या व्यापार और कैरियर को पूरी तरह समर्पित युवाओं के पास तो अपने लिए फुर्सत के क्षण नहीं होते। शारीरिक और मानसिक मांग के कारण वे विवाह तो करना चाहते हैं किंतु पत्नी के नाज-नखरे उठाने या शिकायतों को सुनने के लिए समय निकालना उनके लिए खासी कसरत का काम है।

इस स्थिति में परिपक्व महिला से विवाह ही यह सुविधा प्रदान करता है कि पत्नी छोटी मोटी चीजों के लिए पति पर निर्भर तो बिल्कुल नहीं है बल्कि विभिन्न दबावों व समस्याओं का सामना करने में भी पति का सहारा बन सकती है। वे ऐसी पत्नी चाहते हैं जिसके साथ वे अपने कामकाजी जीवन व मानसिक उलझनें बांट सकें।

एक अन्य मनोवैज्ञानिक पहलू यह भी है कि पुरुष कम उम्र की लड़कियों के सम्मुख एक विशेष तरह का दबाव महसूस करते हैं और वह है हर दृष्टि से हीरो बनने का दवाब। उन्हें लगता है जीवन साथी की किसी कसौटी पर अगर वे खरे नहीं उतरे तो क्या होगा? उनकी छवि पर पानी फिर जाएगा। अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति पर यह दबाव नहीं रहता कि उसे हर दृष्टि से हीरो बने रहना है। यहां तक कि पत्नी ही शिक्षक की भूमिका में होती है या जीवन को नजदीक से देखने के अनुभव के कारण वह पति से अतिरंजित अपेक्षाएं नहीं पालती।

इस तरह के विवाहों में सब कुछ उजला उजला ही है, ऐसा नहीं है। ऐसा विवाह यदि किसी मजबूरीवश किया गया हो तो पति-पत्नी हीन भावना का शिकार हो सकते हैं। प्रचलित मापदंडों के विरुद्ध जाकर कदम उठाने के लिए एक खास तरह की हिम्मत होनी चाहिए। ऐसे ही एक युगल का कहना है कि उनमें आपसी समझ यानी अंडरस्टैंडिंग है किंतु वे जब भी पार्टियों में जाते हैं तो लोग उन्हें विशिष्ट नजरों से देखते हैं। इससे बचने के लिए उन्होंने उन जगहों पर जाना छोड़ दिया जहां लोग इस राज से वाकिफ थे।

कहीं पत्नी में अपनी बड़ी उम्र को लेकर ग्रंथि पनप आती है तो कहीं पुरुष को लगने लगता है कि पत्नी का व्यक्तित्व उस पर हावी है। पति को लगता है कि वे पत्नी सत्ता के अधीन है और पत्नी उन पर अधिकार जताती है।

शारीरिक सामर्थ्य भी कहीं-कहीं बाधा बन जाता है। अपने से दस वर्ष बड़ी स्त्री के पति विवेक का प्रकरण ऐसा ही है। विवाह के समय पत्नी खासी युवा और आकर्षक थी। एक कालावधि के बाद विवेक तो काफी आकर्षक और ऊर्जावान थे किंतु पत्नी उनकी चुस्ती, फुर्ती के साथ कदम मिलाकर चलने में असमर्थता महसूस करती है। शारीरिक असंतुलन यौन संबंधों में असंतोष को भी जन्म दे सकता है और बात तलाक तक पहुंचती है।

इन कारणों से ऐसे विवाहों में बिखराव आता ही है, ऐसा आवश्यक नहीं है। कई प्रसिद्ध हस्तियां इसका उदाहरण हैं। सच्चाई यह है कि प्यार भले ही दिल का मामला हो, विवाह को यथार्थ की कसौटी पर कसते समय दिल के साथ-साथ दिमाग का भी सम्मिश्रण किया जाए तो खुशियां आपसे बचकर कहीं नहीं जा सकतीं। एम. कृष्णा राव ‘राज’(उर्वशी)

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