बचपन में ही बच्चे के कोमल मन पर भयानक दबाव पड़ने से अक्सर बच्चे डरपोक बन जाते हैं। जिन परिवारों में बच्चों को अधिक दबाव और हर समय मारपीट सहनी पड़ती है, ऐसे बच्चे गंभीर रूप से आतंकित, डरे-डरे व सहमे-सहमे से नजर आएंगे। ऐसे बच्चे सदैव एकान्त या अकेलापन ढूंढकर अपने आप में ही खुश रहने का प्रयास करते हैं। उन्हें किसी से भी बातचीत में दिलचस्पी नहीं होती है। ऐसे बहुत सारे बच्चे हैं जो जाने-अनजाने में माता-पिता के गुस्से के कारण डरपोक बनते चले जाते हैं। बचपन में बच्चे के डरपोक होने के निम्न कारण हो सकते हैं-
बचपन में कोई भयानक हादसा, जैसे कोई कत्ल, दुर्घटना आदि का दृश्य देखना अथवा किसी की हवस का शिकार हो जाना।
मां की जरूरत से ज्यादा सख्ती एवं मारपीट का भय, किसी डरावनी फिल्म के दृश्य से अथवा उपन्यासों की कहानियों से भी कभी-कभार बच्चों के दिल में डर बैठ जाता है।
अचानक भयानक पशु-पक्षियों के दिख जाने के कारण, स्कूल में शरारती बच्चों द्वारा पिटाई और धमकी के कारण मन में भय बैठ जाता है। बचपन में डरे हुए बच्चों में कायरता एवं दब्बूपन बढ़ने लगता है। ऐसे में बच्चों को किस प्रकार प्रेरित करके सम्मान अवस्था में लाकर उन्हें भयमुक्त रखा जाए? इसके लिए निम्न सुझावों पर गौर फरमाएं:-
बच्चों की कोमल भावनाओं को समझकर उनकी मन की बातों को समझें। हर समय उन पर सिर्फ पढ़ने के लिए ही दबाव न डालें। बच्चों को पढ़ने के साथ-साथ खेलकूद के लिए भी पर्याप्त समय दें।
बच्चे द्वारा कोई अच्छा कार्य किये जाने पर सामूहिक रूप से उनकी प्रशंसा करें और आगे भी ऐसे कार्य करते रहने के लिए प्रोत्साहित करें। इससे बच्चे का मनोबल ऊंचा होगा।
घर में बच्चों के साथ बैठकर डरावनी फिल्में कभी न देखें। उपन्यास, डरावनी कहानियां इत्यादि भी घर में लाकर न रखें। बच्चों को महीने में कम से कम एक बार बाहर घुमाने-फिराने जरूर ले जाएं।
उन्हें समय-समय पर अपने बजट के अनुसार खिलौने जरूर दिलवायें। बच्चों के मन में सदैव सच्चाई, ईमानदारी और बहादुरी की भावनाएं उत्पन्न करने की कोशिश करें। उन्हें विद्वानों से जुड़ी कहानियां तथा प्रसंग सुनायें।
बच्चों के साथ बात-बात पर मारपीट न करें क्योंकि इससे उनके मन में माता-पिता के प्रति भय की दीवार मजबूत होती जायेगी और उनके दिल में यह धारणा समा जाएगी कि मम्मी-पापा तो सिर्फ पिटाई ही करते हैं। ऐसे में बच्चे मम्मी पापा से नफरत भी करने लगेंगे।
बच्चों के ऊपर हर समय अपनी तानाशाही चलाने के बजाए उनके साथ अपनत्व और प्रेम का व्यवहार भी करें।
समय-समय पर बच्चों को सर्कस अथवा चिड़ियाघर दिखाने ले जाएं। वहाँ विभिन्न पशुओं के बारे में जानकारी मिलने के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी होगा।
ध्यान रखें कि बच्चों के नाजुक दिल पर कोई भी असर उन्हें साहसी या डरपोक बना सकता है। उपरोक्त बातों को अपनाकर आप अपने बच्चे की जिन्दगी को खुशहाल बना सकते हैं।
ऐसी कोई भूल न होने दें जिसकी वजह से आपका लाडला डरपोक या दब्बू बने वरना बच्चे की इस हालत के जिम्मेदार आप स्वयं होंगे। डाॅ. सविता बिहानियां(उर्वशी)