बांकुड़ा: भले ही राजा रहे न राजपाट, लेकिन सदियों पुरानी परंपरा की डोर आज भी अटूट है। ऐतिहासिक विष्णुपुर राजघराने में कुलदेवी मां मृण्मयी की 1030 साल पुरानी ऐतिहासिक दुर्गापूजा तोपों की गूंज के साथ शुरू हो गई। बंगाल में जहां षष्ठी से दुर्गोत्सव की शुरुआत मानी जाती है, वहीं इस राजपरिवार में उत्सव करीब पखवाड़े भर पहले कृष्णा नवमी से ही शुरू हो जाता है।
शनिवार सुबह फौजदार परिवार द्वारा हाथ से चित्रित 'बड़ी ठकुरानी' (महाकाली) के पट को राजपुरोहित और राजपरिवार के वर्तमान सदस्य ऐतिहासिक माधव सायेर (तालाब) ले गए। वहां महास्नान के बाद ढोल, कांसे और शहनाई की धुनों के बीच भव्य शोभायात्रा निकालकर पट को मृण्मयी मंदिर लाया गया।
तीन तोपें दागकर दी गई सलामी
देवी के मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते ही गोपाल सायेर तट से तीन बार तोप दागकर सलामी दी गई। महिलाओं के पारंपरिक वरण के बाद देवी ने जैसे ही गर्भगृह में प्रवेश किया, फिर तीन तोपें दागी गईं। परंपरा अनुसार मान चतुर्थी को 'मेझो ठकुरानी' (महासरस्वती) और षष्ठी को 'छोटी ठकुरानी' (महालक्ष्मी) विराजेंगी। अष्टमी-नवमी की रात खच्चरवाहिनी 'महामारी' देवी की विशेष पूजा होगी।
997 ईस्वी में जगतमल्ल ने की थी स्थापना
इतिहासकारों के अनुसार, 997 ईस्वी में विष्णुपुर मल्ल साम्राज्य के राजा जगतमल्ल ने स्वप्नादेश के बाद वटवृक्ष के नीचे इस मंदिर की नींव रखी थी। पहले यहां शाक्त पद्धति से बलि दी जाती थी, लेकिन वैष्णव संत श्रीनिवास आचार्य से दीक्षा लेने के बाद राजवंश ने जीव-बलि रोककर ‘शब्द ब्रह्म’ के रूप में तोप दागने की अनोखी परंपरा शुरू की थी। राजपाट भले ही इतिहास बन गया हो, लेकिन मृण्मयी मां के प्रति विष्णुपुरवासियों की अगाध आस्था आज भी पूरी भव्यता के साथ जीवंत है।