छोटा दूल्हा-बड़ी दुल्हन Ai
अपराजिता

छोटा दूल्हा-बड़ी दुल्हन ? नो टेंशन !

आज हजारों ऐसे दम्पति हैं जिनकी पत्नी, पति की उम्र से दो- चार साल बड़ी है। एक समय था जब इस तरह की शादी को ’बेमेल विवाह‘ की संज्ञा दी जाती थी और समाज में इस तरह की शादी की काफी आलोचनाएं भी होती थीं किन्तु आज के यंगस्टर्स शादी करते वक्त उम्र की बंदिश को अहमियत नहीं देते। उन्हें तो एक ऐसा जीवनसाथी चाहिए जो उन्हें समझे, फिर चाहे लड़के की उम्र लड़के की उम्र से दस साल ज्यादा क्यों न हो या फिर लड़की की उम्र लड़के से बड़ी क्यों न हो?

प्राचीन काल की मान्यता के अनुसार विवाह में लड़के से लड़की की छोटी उम्र इसलिए रखी जाती थी ताकि दोनों के बीच पुरुष की अहमियत बनी रहे और वृद्धावस्था के समय पत्नी पति की सेवा अच्छी तरह करने लायक रहे। अगर पत्नी की उम्र पति से अधिक होती तो पति की अपेक्षा पत्नी ही जल्द बूढ़ी हो जाती और पति को ही पत्नी की सेवा करनी पड़ती। इसी कारण पत्नी को प्राचीनकाल में ’दासी‘ भी माना जाता था।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्राचीन काल में पत्नी की उम्र पति की उम्र से कम इसलिए रखी जाती थी ताकि पत्नी हमेशा अपने पति की अधीनता को स्वीकार करती रहे और पति के मन में हीन भावना न पनप सके किन्तु आज के युवा बड़ी उम्र की लड़कियों को इसलिए तरजीह देते हैं क्योंकि उन्हें एक समझदार पत्नी की तलाश होती है। उनका ’ब्यूटी विद् ब्रेन‘ का कांन्सेप्ट क्लीयर होता है।

चिकित्सकों के अनुसार लड़की की उम्र लड़के से बड़ी होने पर दोनों में से किसी के शरीर पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि लड़की मानसिक एवं शारीरिक दोनों ही तौर पर गर्भधारण के लिए परिपक्व रहती है। बड़ी उम्र की लड़कियों के साथ एडजस्टमेंट में ज्यादा परेशानी नहीं होती।

एम.बी.ए. कर रहे संतोष का इस संबंध में मानना है कि बड़ी उम्र की लड़की से शादी करने पर शुरू में तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चलता है किन्तु कुछ दिनों बाद ही जब दोनों में छोटी-मोटी बातों को लेकर बहस होने लगती है और लड़के को लड़की की बातें नसीहत या लेक्चर जैसी लगने लगती है तो लड़के को लगने लगता है कि बड़ी उम्र की लड़की से शादी करके वह ’दूसरी मम्मी‘ को घर ले आया है।

मेडिकल की छात्रा सुनाली का इस संबंध में मानना है कि लाइफ पार्टनर छोटा हो या बड़ा, इससे लड़की को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लड़कियां ’एडजस्टमेंट‘ करना जानती हैं। आज के समय में ’पति-पत्नी‘ की मिथक धारणाएं टूटी हैं और ’लाइफ पार्टनर‘ की धारणा को मजबूती मिली है। दोनों की भावनाओं का दोनों ही सम्मान करें, हर कदम पर दोनों एक-दूसरे के साथ हों तो प्यार और शादी में उम्र का फासला कोई मायने नहीं रखता। अगर मुझसे दस साल छोटा लड़का भी मुझे खुश रख सके तो मुझे उससे शादी करने में कोई हिचक नहीं होगी।

इस बात को अब अभिभावक भी समझने लगे हैं इसलिए अपनी संतानों की खुशी के लिए वे ऐसे जोड़े को अपना आशीर्वाद देने लगे हैं। मनोरमा की शादी की बात एक बैंक ऑफिसर से चल रही थी। बात जब आगे बढ़ी तब पता चला कि लड़का मनोरमा से पांच साल छोटा है। मनोरमा की मम्मी आशा पाठक कहती हैं-’मैं असमंजस में थी क्योंकि हमारे यहां ऐसी शादी अब तक नहीं हुई थी। इतना अच्छा लड़का हाथ से भी नहीं जाने देना चाहती थी। बहुत सोच विचार कर हमने शादी का निर्णय ले लिया। आज मेरी बेटी-दामाद दोनों ही खुश हैं। दो नातियों की नानी हूं।

जमाने के साथ कदमताल मिलाना है तो ऐसी समझदारी तो दिखानी ही होगी नहीं तो बेवजह रिश्ता ढूंढ़ने में परेशानी बढ़ेगी। कभी अच्छा दामाद नहीं मिलेगा तो कभी अच्छी बहू। आज की बालाओं को भी उम्र की कोई परेशानी नजर नहीं आती। उन्हें भी सपनों का शहजादा वही दिखाई देता है जो उन्हें भरपूर प्यार करे। प्यार क्या उम्र का मोहताज है? अब लड़के भी इस बात को समझने लगे हैं। परमानन्द परम(उर्वशी)

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