पुरुषों की भूमिका AI Generated Image
अपराजिता

बदलते दौर में बढ़ रही हैं परिवार में पुरुषों की जिम्मेदारियां भी

Om Prakash Mishra

परिवर्तन की शुरुआत

हमारा समाज पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान रहा है, जहाँ परिवार से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वाह मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा ही किया जाता था। हालाँकि, वर्तमान समय में पुरुषों की इन जिम्मेदारियों और भूमिकाओं में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है। इस परिवर्तन का मुख्य कारण महिलाओं में बढ़ती साक्षरता, उनकी आत्मनिर्भरता तथा अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति अधिक जागरूकता और सक्रियता है।

ग्रामीण भारत में पुरुषों का बदलता दृष्टिकोण

अतीत में ग्रामीण पुरुषों की जिम्मेदारियाँ मुख्य रूप से खेती-बाड़ी, नौकरी, घर का आर्थिक प्रबंधन और बेटियों के विवाह तक ही सीमित थीं। परंतु आज ग्रामीण पुरुष गाँव के समग्र विकास, बेटियों की उच्च शिक्षा और उनकी अंतर्निहित क्षमताओं को निखारने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इतना ही नहीं, वे घर के दैनिक कार्यों में भी सहयोग देने लगे हैं। पिता के इसी सहयोग और मार्गदर्शन का परिणाम है कि आज एक साधारण ग्रामीण किसान की बेटी भी आई.ए.एस. अधिकारी बनने का सपना पूरा कर पा रही है।

ग्रामीण परिवारों में सहभागिता और खुशहाली

आज ग्रामीण पुरुषों ने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का दायरा बढ़ाकर समाज को शिक्षित और सभ्य बनाने का बीड़ा उठाया है। दूसरी ओर, गृहणियों ने भी बाहर के कई कार्यों की बागडोर अपने हाथों में लेकर पुरुषों के आर्थिक व मानसिक बोझ को साझा किया है। दोनों के इस परस्पर सहयोग का जीवंत प्रमाण गाँवों में बढ़ती खुशहाली और सकारात्मक माहौल के रूप में दिखाई देता है।

शहरी क्षेत्रों में पारिवारिक ढाँचा और नई जिम्मेदारियाँ

शहरी क्षेत्रों में भी समय के साथ पुरुषों के दायित्वों में बड़ा बदलाव आया है। आज कई परिवारों में पति केवल नाममात्र के 'गृह-प्रमुख' होते हैं, जबकि घर के प्रबंधन की वास्तविक कर्णधार पत्नी होती है। वर्तमान में पुरुष केवल आजीविका कमाने और आर्थिक साधन जुटाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे घर-गृहस्थी, रसोई, बच्चों के लालन-पालन और दैनिक व्यवस्थाओं से जुड़ी जिम्मेदारियों को भी सहजता से स्वीकार कर रहे हैं।

दोहरी आय वाले परिवारों में पुरुषों का सहयोग

बढ़ती महँगाई, जीवनशैली के खर्चों और आर्थिक रूप से सशक्त होने की होड़ के कारण आज महिलाएँ घर की देखभाल के साथ-साथ नौकरियों में भी बराबरी से योगदान दे रही हैं। ऐसे परिवारों में पुरुषों का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है। जहाँ पति-पत्नी दोनों कार्यरत हैं, वहाँ पति रसोई के काम, बच्चों की शिक्षा, उनकी देखभाल और घर की सफ़ाई में पत्नी का पूरा हाथ बँटाते हैं। यहाँ तक कि पत्नी के देर से या थके-हारे लौटने पर पति उनके लिए चाय बनाने और सहज माहौल देने में संकोच नहीं करते।

संवेदनशीलता और समानता का बढ़ता प्रभाव

ज़रूरत पड़ने या पत्नी के अस्वस्थ होने पर आज के भारतीय पुरुष सहर्ष कपड़े धोने, खाना बनाने और परिवार की पूरी सेवा करने को तत्पर रहते हैं। पिता के मार्गदर्शन, माँ के समर्पण, भाई के सहयोग और स्वयं बेटियों की लगन ने आज महिलाओं को समाज में उच्च शिक्षा, प्रतिष्ठित पद और पहचान दिलाई है। पहले बेटे-बेटी के भेदभाव ने बेटियों के सामर्थ्य को दबा दिया था, लेकिन बेटियों की मेहनत और आगे बढ़ने की लगन ने माता-पिता की सोच बदल दी है। आज पुरुष (पति या पिता के रूप में) अपना प्रभुत्व या अहम् दिखाने के बजाय, नम्रता और सहकारिता के साथ पूरे परिवार को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं।(उर्वशी)

अनिता कुशवाहा

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