शहरों के पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा युवाओं के बीच एक नया शब्द तेजी से आया है—डिंक। DINK यानी ‘डबल इनकम नो किड्स’
भारत में विवाह दो आत्माओं का मिलन और नई पीढ़ी को दुनिया में लाने का पवित्र बंधन रहा है। शादी के कुछ महीनो बाद ही प्राय घर के बड़े बातों बातों में नव दंपति से पूछ लेते थे “खुशखबरी कब दे रहे हो?” लेकिन अब यह स्थिति पूरी तरह बदलती हुई दिखाई दे रही है। शहरों के पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा युवाओं के बीच एक नया शब्द तेजी से आया है—डिंक। DINK यानी ‘डबल इनकम नो किड्स’ मतलब साफ है पति-पत्नी दोनों कमाएं मगर बच्चे न हों। भारत में यह सामाजिक बदलाव की ख़तरनाक घंटी है क्योंकि इस प्रवृत्ति के चलते हम ऐसे समाज में रह रहे होंगे जहां “हम दोनों और कोई नहीं” की सोच ही मुख्य होगी।
संयुक्त परिवार सिकुड़कर एकल परिवारों में बदल गए और अब अपने बच्चों से भी मुक्ति का नया ट्रेंड दिखाई दे रहा है।
‘डिंक’ शब्द भले पश्चिम से आया हो, लेकिन भारत में इसके पीछे की ज़मीन हमारी अपनी बदलती सामाजिक परिस्थितियों ने तैयार की है। संयुक्त परिवार सिकुड़कर एकल परिवारों में बदल गए और अब अपने बच्चों से भी मुक्ति का नया ट्रेंड दिखाई दे रहा है। नई पीढ़ी इस बदलाव को अलग तरह से देख रही है। वह पूछती है-जब ज़िंदगी में पहले ही इतनी भागदौड़ है तो क्या बच्चे को समय दे पाएंगे? क्या नौकरी बची रहेगी? क्या करियर रुक जाएगा? क्या अपनी इच्छाएं अधूरी रह जाएंगी? क्या महंगे शहर में बच्चे को अच्छी शिक्षा और बेहतर भविष्य दे पाएंगे? महंगाई ने इन प्रश्नों को और गंभीर बना दिया है।
...बिना बच्चों का जीवन अपेक्षाकृत अधिक सहज दिखाई देता है। दो कमाने वाले, अपना घर, घूमना फिरना, आज़ादी, अपनी गाड़ी, अपने शौक और अपनी कमाई पर अपना अधिकार- यही तस्वीर आकर्षक दिखती है आज के युवाओं को।
महानगरों में घर, स्कूल, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजमर्रा की ज़रूरतों का खर्च बढ़ा है। मध्यमवर्गीय दंपति को लगता है कि दो आय होने के बावजूद बच्चे के भविष्य की आर्थिक चिंता लगातार बनी रहेगी। इसके विपरीत बिना बच्चों का जीवन अपेक्षाकृत अधिक सहज दिखाई देता है। दो कमाने वाले, अपना घर, घूमना फिरना, आज़ादी, अपनी गाड़ी, अपने शौक और अपनी कमाई पर अपना अधिकार- यही तस्वीर आकर्षक दिखती है आज के युवाओं को। इस बदलाव में महिलाओं की बढ़ती शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। जिस महिला से कभी विवाह के बाद नौकरी छोड़ने की अपेक्षा की जाती थी, वह आज अपने पेशे और पहचान को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानती है। उसके लिए मातृत्व अब सामाजिक अनिवार्यता नहीं, व्यक्तिगत निर्णय बन रहा है। यहां भारतीय समाज की एक विडंबना सामने आती है। हम चाहते हैं कि महिला नौकरी भी करे, घर भी संभाले, बच्चों को भी पाले और परिवार की सारी अपेक्षाएं भी पूरी करे। ऐसे में कुछ महिलाएं स्वाभाविक रूप से पूछती हैं-यदि जिम्मेदारियां बराबर नहीं बंटनी हैं तो मातृत्व की कीमत केवल उसे ही क्यों चुकानी पड़े ? पुरुषों की सोच भी बदल रही है। नई पीढ़ी का युवक केवल कमाने वाली मशीन बनकर जीवन नहीं बिताना चाहता। वह यात्रा करना चाहता है, अपने साथी के साथ समय बिताना चाहता है और जीवन का आनंद लेना चाहता है। कई युवाओं के लिए पितृत्व अब सामाजिक दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया जाने वाला विकल्प है।
हम चाहते हैं कि महिला नौकरी भी करे, घर भी संभाले, बच्चों को भी पाले और परिवार की सारी अपेक्षाएं भी पूरी करे। ऐसे में कुछ महिलाएं स्वाभाविक रूप से पूछती हैं-यदि जिम्मेदारियां बराबर नहीं बंटनी हैं तो मातृत्व की कीमत केवल उसे ही क्यों चुकानी पड़े ?
बच्चे के बिना उन्हें जीवन समस्यामुक्त लग रहा है मगर सोशल मीडिया ज़िंदगी का पूरा सच नहीं दिखाता। कैमरे से हटकर , बीमारी, अकेलापन, रिश्तों का तनाव और बुढ़ापे की चिंता किसी तस्वीर में आसानी से दिखाई नहीं देती । यहीं से ‘डिंक’ की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।
सोशल मीडिया ने इस बदलाव को एक नया आकर्षण दिया है। बिना बच्चों वाले दंपति के लिए घूमना, अच्छे रेस्तरां, शानदार घर, पालतू जानवर, सप्ताहांत की यात्राएं और अपने लिए भरपूर समय सबसे महत्वपूर्ण बन गया है। बच्चे के बिना उन्हें जीवन समस्यामुक्त लग रहा है मगर सोशल मीडिया ज़िंदगी का पूरा सच नहीं दिखाता। कैमरे से हटकर , बीमारी, अकेलापन, रिश्तों का तनाव और बुढ़ापे की चिंता किसी तस्वीर में आसानी से दिखाई नहीं देती । यहीं से ‘डिंक’ की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। संतान न होने की स्थिति में वृद्धावस्था के सामाजिक और भावनात्मक खालीपन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे कठिन परिस्थिति तब बनती है जब पति-पत्नी का विचार बदल जाए।
आज दोनों कहें कि बच्चे नहीं चाहिए और दस वर्ष बाद एक साथी के भीतर मातृत्व या पितृत्व की तीव्र इच्छा पैदा हो जाए तो उनके सामने असाधारण परिस्थितियां खड़ी हो सकती हैं। परिवार में तनाव बढ़ सकता है, क्योंकि ज्यादा उम्र होने पर अनेक शारीरिक एवं मानसिक समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं और ऐसे में बुढ़ापा एकाकी रहकर बिताना एक मज़बूरी बन जाती है। तब जीवन एक आनंद नहीं बोझ लगने लगता है।
राष्ट्रीय एवं सामाजिक स्तर पर भी इस प्रवृत्ति के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। भारत आज अपनी विशाल युवा आबादी को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानता है लेकिन यदि आने वाली पीढ़ियों में विवाह और संतान के प्रति रुचि लगातार घटती गई तो कुछ दशकों बाद युवा आबादी का अनुपात कम और बुजुर्ग आबादी का अधिक हो जाएगी। तब सवाल केवल परिवार का नहीं रहेगा। काम करने वाले हाथ कौन होंगे, वृद्धों की देखभाल कौन करेगा और सामाजिक सुरक्षा का भार कौन उठाएगा? तब यह प्रश्न सबसे ज्वलंत प्रश्न होंगे।
लेकिन‘डिंक’प्रवृत्ति को खलनायक बना देना समस्या का समाधान नहीं है। भारतीय समाज को यह भी देखना होगा कि युवा बच्चे क्यों नहीं चाहते। यदि कारण महंगाई, महंगा आवास, असुरक्षित रोजगार, महिलाओं के करियर की चिंता, बच्चों की शिक्षा का भारी खर्च और परिवार के सहयोग का अभाव है तो केवल युवाओं को संस्कारों का पाठ पढ़ाने से काम नहीं चलेगा। संतान चाहने वाले दंपतियों के लिए भी समाज को अनुकूल वातावरण बनाना होगा।
स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी नहीं, जिम्मेदारी स्वीकार करना है। डिंक जीवन चुनने वाला दंपति यदि आर्थिक रूप से सुरक्षित है, अपने भविष्य की योजना बनाता है, माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी निभाता है, रिश्तों को जीवित रखता है और वृद्धावस्था के लिए भावनात्मक-सामाजिक आधार तैयार करता है तो उसके निर्णय का सम्मान होना चाहिए । सवाल यह नहीं है कि डिंक सही है या ग़लत। सवाल यह है कि हम जीवन का फैसला आज की चमक देखकर कर रहे हैं या आने वाले पूरे जीवन को सामने रखकर?
न तो युवाओं को बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर करना चाहिए और न संतानहीनता को आधुनिकता का तमगा देना चाहिए। ज़रूरत है ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की जिसमें जो दंपति बच्चे चाहते हैं, उन्हें बच्चे पालना बोझ न लगे और जो बच्चे नहीं चाहते, उनके निर्णय को भी समझदारी से देखा जाए। दो कमाने वाले होना उपलब्धि है, बच्चे न होना चुनाव है; मगर चुनाव इतना सोच-समझकर हो कि भविष्य में पछतावा उसकी कीमत न बन जाए।(उर्वशी)