साहित्यकार मधुमक्खी के समान होता है। मधुमक्खी विभिन्न प्रकार के फूलों पर मंडराती है। जो मधुमक्खी जितने अधिक फूलों तक पहुँचेगी, उसका मधु उतना अधिक गुणकारी होगा। मैं भी एक विनम्र विद्यार्थी की तरह दुनिया से कुछ सीखना चाहता हूँ। इस क्रम में कभी देश की सीमाओं में तो कभी उसके बाहर भी जाना पड़े तो मैं सदैव तैयार रहा हूँ। सीखने का यह क्रम सतत् जारी रहे, ऐसा प्रयास रहेगा। मेरा मानना है कि यह ब्रह्मांड भी एक विश्वविद्यालय है जहाँ हम सब बहुत कुछ सीखते हैं। मैं भी इसका अपवाद नहीं हो सकता।
यात्राएं हमें नई दुनिया से जोड़ती हैं। नए संबंध बनते हैं तो पुराने संबंधों का नवीकरण भी होता है। संवाद का सर्वश्रेष्ठ माध्यम यात्राएं ही हैं जहाँ एक-दूसरे को करीब से समझने का अवसर मिलता है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान का यह सिलसिला सदियों से जारी है जो अनन्तकाल तक जारी भी रहने वाला है।
बेशक पुरातन काल में विदेश यात्रा को अच्छा नहीं समझा जाता था लेकिन आज के जिज्ञासु और भौतिक युग में विदेश गमन जीवन का अंग बनता जा रहा है।
रोजी-रोटी से शिक्षा प्राप्ति तक विदेश प्रवास सम्मान की श्रेणी में खड़ा किया जा चुका है। कभी व्यापार के लिए ही यात्राएं होती थी लेकिन आज पर्यटन ने व्यापार और वैवाहिक संबंधों के लिए विदेश यात्राओं को काफी पीछे छोड़ दिया है। हाँ, यह सच है कि सभी विदेश नहीं जा सकते लेकिन ऐसा कौन है जिसे चाह ही न रही हो।
कुछ यात्राएं इतिहास बनाती हैं तो कुछ सांस्कृतिक सोच को बदलने में अहम भूमिका निभाती हैं। स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ की विदेश यात्राओं ने भारत के प्रति पूरी दुनिया के दृष्टिकोण को बदलकर रख दिया। टिहरी रियासत के तत्कालीन नरेश कीर्तिशाह ने स्वामी रामतीर्थ के जापान में होने वाले विश्व धर्म सम्मेलन में जाने की व्यवस्था की। वे जापान से अमेरिका तथा इजिप्ट (मिस्र) भी गए। विदेश यात्रा में स्वामीजी ने भारतीय संस्कृति का उद्घोष किया तथा विदेश से लौटकर भारत में भी अनेक स्थानों पर प्रवचन दिये। उनके व्यावहारिक वेदान्त पर विद्वानों ने सर्वत्र चर्चा की।
इसी प्रकार से स्वामी विवेकानंद जी की विदेश यात्रा की व्यवस्था खेतड़ी के राजा ने की। यह स्वामीद्वय जहाँ-जहाँ पहुँचा, लोगों ने उनका स्वागत किया। उनके व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण था जो भी उनसे मिलता,उन्हें सुनता, वह अपने अन्दर एक शान्तिमूलक चेतना का अनुभव करता। उन्होंने प्रेम का संदेश दिया। विवेकानंद जी ने शिकागो में सभा कोे भाई-बहनों के नाम से संबोधित किया तो सभी अभिभूत हो उठे।
स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे, ‘आप लोग देश और ज्ञान के लिये सहर्ष प्राणों का उत्सर्ग कर सकते हैं। यह वेदान्त के अनुकूल है पर आप जिन सुख साधनों पर भरोसा करते हैं उसी अनुपात में इच्छाएँ बढ़ती हैं। शाश्वत् शान्ति का एकमात्र उपाय है आत्मज्ञान। अपने आपको पहचानो, तुम स्वयं ईश्वर हो।’
एक विद्वान् का कथन है, ‘यदि जीवन में यौवनपूर्ण प्राण हों तो उस अज्ञात का आमंत्रण टाले नहीं टलता। अज्ञात का पीछा करना, उसका अनुभव करना, उसे पाकर ज्ञात बनाना ही जीवन का बड़े से बड़ा आनंद और अच्छे से अच्छा पौष्टिक अन्न है।’
इसी प्रकार रूसी लेखक गोगोल का मत है, ‘किसी दूसरे के लिखे यात्रा वृतान्त को पढ़कर मानसिक रूप से दूर स्थानों की यात्रा सम्भव है, इसलिए इस प्रकार के संस्मरण भविष्य में विदेश जानेवालों के लिए एक प्रकार की जानकारी अथवा प्रशिक्षण सरीखा हो सकते हैं। यह एक अच्छा सुझाव हो सकता है कि पहली बार विदेश यात्रा करने वालों को मेजबान देश की संस्कृति का सामान्य सा प्रशिक्षण दिया जाए क्योंकि जानकारी के अभाव में अथवा अलग-अलग सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण बहुत सी ग़लतफ़हमियाँ उत्पन्न हो जाती है जिससे उन्हें घुलने-मिलने मे बहुत कठिनाई होती है और यात्रा का न तो वास्तविक आनंद रहता है और न ही दो संस्कृतियों को निकट लाने का उद्देश्य सफल होता है। यात्रा से पूर्व इस प्रकार के संस्मरण पढ़ना जहाँ बहुत कुछ उत्सुकता बढ़ाता है वहीं अनेक प्रकार की ग़लतफहमियाें को भी काफ़ी हद तक कम कर सकता है।’
सदियों से भारत विदेशियों को आकर्षित करता रहा है। अमेरिका की खोज करने वाला कोलम्बस भी उल्टी दिशा से भारत ही आ रहा था और रास्ते में पड़ने वाले अमेरिका को अनेक वर्षों तक भारत ही समझता रहा। यहाँ आने वाले बहुत-से विदेशियों में से किसी ने शोधार्थी के रूप में तो किसी ने इतिहासकार की दृष्टि से भारत को देखा और यहाँ के तत्कालीन शासक, शासन व्यवस्था, सांस्कृतिक, धार्मिक रीति-रिवाज, आर्थिक व सामाजिक स्थिति आदि का वर्णन किया।
जहाँ तक यात्रा-वृतान्तों की उपयोगिता का प्रश्न है, इतिहास साक्षी है कि प्रसिद्ध यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में जिस प्रकार भारत और उसके मंदिरों का विवरण लिखा था, उससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन् 1024 में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट किया।
फ़ाहियान एक चीनी बौद्ध भिक्षु था जो 399 से 412 तक भारत, श्रीलंका और आधुनिक नेपाल में स्थित गौतम बुद्ध के जन्मस्थल कपिलवस्तु धर्मयात्रा पर आया। उनका ध्येय यहाँ से बौद्ध ग्रन्थ एकत्रित कर उन्हें चीन ले जाना था। उसने अपनी यात्रा का वर्णन एक वृत्तांत में लिखा था जिसका नाम है ‘बौद्ध राज्यों का एक अभिलेख’। उस समय भारत में गुप्त राजवंश के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का काल था और चीन में जिन राजवंश काल चल रहा था। वह रेशम मार्ग से आया और अपने यात्रा-वृत्तांत में रास्ते के मध्य एशियाई देशों के बारे में लिखा है।
सर्द रेगिस्तानों और विषम पहाड़ी दर्रों से गुज़रते हुए वे भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तरी क्षेत्र में दाखि़ल होकर पाटलिपुत्रा पहुँचे। वे दक्षिण में श्रीलंका भी गए। इस तरह स्थान-स्थान से एकत्रित किये गये बौद्ध ग्रन्थ और प्रतिमाएँ लेकर वे समुद्री मार्ग से आगे बढ़े तो एक भयंकर तूफ़ान ने उनके जहाज़ को भटकाकर जावा द्वीप (आधुनिक इंडोनेशिया) पहुँचा दिया।
उसके पश्चात् अल-बरुनी ने चीन के आधुनिक शानदोंग प्रान्त में लाओशान पहुँचकर अपने साथ लाई सामग्री को संगठित और अनुवादित किया। सत्रहवीं सदी में जब फ्रांस से फैंव्किस बर्नियर अनेक देशों की यात्रा करता हुआ भारत पहुँचा तो उस मुगल बादशाह शाहजहाँ का अन्तिम चरण था। बर्नियर ने आठ वर्षों तक उनकी नौकरी की और उस समय के युद्ध की कई प्रधान घटनाओं को अपनी आँखों से देखा था। मनुष्य सदा से ही घुमक्कड़ रहा है। बाल्यकाल से प्रौढ़ावस्था तक मौका मिलते ही दूर देश की यात्राएं करता है। इस भ्रमण के अनेक पात्र और परिस्थितियां उसके मानस-पटल पर अंकित हो जाती हैं।
आदिकाल से जारी यात्राओं का यह सिलसिला ही तो मानव विकास की यात्रा है। गुलीवर की रोमांचक यात्राओं का रसास्वादन करने वाले विश्व की परिस्थितियां आज बहुत हद तक बदल चुकी है। आज भू-मण्डलीकरण और हवाई जहाज की यात्रा की सुलभता के कारण सुदूर और दुर्गम स्थानों पर जाना भी सुगम हो गया है, इसलिए लगभग सभी लोग यात्राएं करने लगे हैं। बेशक आज व्यवसायिक और धार्मिक यात्राएं ही अधिक होती है लेकिन पर्यटन को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
हर यात्री के अपने खट्टे-मीठे अनुभव होते हैं जिन्हें वह अपने मित्रों और परिजनों में बाँटता है तो कुछ लोग उन्हें लेखनीबद्ध भी करते हैं। कोई साहित्यकार जब यात्रा करता है तो वह सांस्कृतिक इतिहास के उन अनखुले और अधखुले पक्षों को भी टटोलता है। उसकी विशिष्ट दृष्टि और सृजनात्मक क्षमता सामान्य यात्रियों से भिन्न होने के कारण उसके द्वारा रचित यात्रा वर्णन पाठक के ज्ञानकोष को समृद्ध करते हैं। उन्हें पढ़ते हुए पाठक मानसिक रूप से वर्णित स्थान तक पहुँच जाता है।
आलोचकों की दृष्टि में यात्रा-वृत्तान्तों में वर्णित स्थान के प्राकृतिक दृश्यों की रमणीयता, जीवन सन्दर्भ, प्राचीन एवं नवीन सौन्दर्य-चेतना की प्रतीक कलाकृत्तियों की भव्यता तथा मानवीय सभ्यता के विकास का ऐसा रेखाचित्र होना चाहिए जिससे पाठक की जिज्ञासा तुष्ट हो सके। अतः यात्रा-वृत्तान्त में उस स्थान के भौतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक आदि पक्षों का समावेश उसकी गुणवत्ता की कसौटी है।
मुझे भी हर दिन कुछ नया जानने का जनून है। देश के लगभग सभी राज्यों के जन-जीवन और प्रकृति को निकट से जानने का सौभाग्य प्राप्त होने के बाद विश्व को जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। मेरी विदेश यात्राएं बेशक साहित्यिक कारणों से हुई लेकिन एक विद्यार्थी के रूप में हर क्षण नये अध्याय पढ़ना मेरा शौक रहा है।
इन्द्रप्रस्थ भारत की राजधानी दिल्ली का प्राचीन नाम है। पाण्डवों का किला तथा कुछ अन्य अवशेष अपने समय का इतिहास स्वयं कहते हैं। इतिहास की पुस्तकों में कैद उन महान के मूक गवाह इन पत्थरों, खंडहरों से बहुत कुछ सुना और जाना जा सकता है इसीलिए तो हजारों लोग प्रतिदिन वहाँ पहुँचते हैं। ठीक इसी प्रकार रोम की सभ्यता भी कभी अपने उत्कर्ष पर थी। सारी दुनिया में उसका डंका बजता था। रोम के खंडहर आज भी अपनी गाथा स्वयं कहते हैं। मैंने इतिहास के दो धुंधले पड़ते अध्यायों को फिर से पढ़ने और दूसरों को सुनाने का प्रयास किया है ताकि विश्व की दो महान संस्कृतियों को और निकट से जाना जा सके। डाॅ. विनोद बब्बर(उर्वशी)