हमारी पहचान, हमारे गांव AI Generated Image
साहित्य

हमारी पहचान, हमारे गाँव

भारत को देखना है तो गाँव की ओर ही चलना चाहिए

देश के विकास का पहिया कितनी ही तेजी से आगे बढ़ता चला जाए, नगरों और महानगरों की संख्या कितनी ही बढ़ जाए, विश्वास करना भारत का हृदय तो गाँवों में ही बसता है। आज भी भारत को देखना है तो गाँव की ओर ही चलना चाहिए। गाँवों में लोक धर्म, परंपरा, रीति-रिवाज, लोक गीत, लोक नृत्य आदि बहुत गुण छिपे हुए हैं। हमारे बुजुर्गों ने समाज का अध्ययन और समाज का विज्ञान दोनों को ही देखा-समझा और प्रयोग किया है। गाँवों में परंपराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वतः ही पहुँच जाती हैं।

आज भी हम देखते हैं कि गाँवों में गली-मोहल्ले की माताएँ एक साथ मंदिर गीत गाते हुए जाती हैं, एक लय और धुन में गाती-मुस्कुराती चली जाती हैं। होली पूजन करना है या कोई अन्य तीज-त्योहार सभी में माताएँ गीत गाती हुई जाती हैं। हमारी बहन-बेटी उन गीतों को सुनती हैं और वह याद हो जाते हैं।

गाँवों में वह सभी कुछ देखने, समझने, सुनने को मिलता है, जो नगरों-महानगरों में कभी भी देख पाना संभव नहीं है। आज भी हम देखते हैं कि गाँवों में गली-मोहल्ले की माताएँ एक साथ मंदिर गीत गाते हुए जाती हैं, एक लय और धुन में गाती-मुस्कुराती चली जाती हैं। होली पूजन करना है या कोई अन्य तीज-त्योहार सभी में माताएँ गीत गाती हुई जाती हैं। हमारी बहन-बेटी उन गीतों को सुनती हैं और वह याद हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यही संस्कार तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्वतः ही चला जा रहा है। इसके साथ ही गाँवों में विवाह संस्कार की बात करें तो उसमें सामाजिक पक्ष बहुत बड़ा कार्य करता है। लड़के या लड़की के विवाह से पहले उसके चाल-चलन के बारे में समाज के लोगों से जान लिया जाता है। विवाह वाले दिन लड़के को घोड़ी या रथ पर बैठाकर गाजे-बाजे के साथ गाँव में घुमाना, मंदिर में पूजा करना आदि।

विचार करें तो लड़के या लड़की तथा उसके परिवार के बारे में जानने का इससे बड़ा सामाजिक अध्ययन क्या हो सकता है।

विचार करें तो इसका एक पक्ष यह भी है कि गाँव वाले देख लें कि यह लड़का अब प्रणय  सूत्र में बंध रहा है। साथ ही इसने कोई अपराध या दूसरा विवाह आदि किया है तो वह भी उजागर हो जाए। इसके साथ ही लड़के को लड़की के गाँव में भी ऐसे ही घोड़ी या रथ पर बैठाकर घुमाया जाता है। विचार करें तो लड़के या लड़की तथा उसके परिवार के बारे में जानने का इससे बड़ा सामाजिक अध्ययन क्या हो सकता है। आज हम अपने पैतृक घरों से दूर कहीं-कहीं शादी कर रहे हैं, जिससे सामाजिक दृष्टि से लड़के-लड़की के व्यवहार का कुछ पता नहीं चल रहा है। यह सभी कुछ कर हम रहे हैं और कह रहें हैं कि समाज बदल रहा है। हम स्वयं को, संस्कृति और संस्कारों को बदल रहे हैं। कुछ लोग इस पर भी अपने अलग विचार रखते हुए विकास के नाम पर संस्कार को छोड़कर, आगे बढ़ने का लेप लगाकर चल देते हैं।

अब प्रश्न यह है कि समाज बदल रहा है या हम अपने आप को बदल रहे हैं। महानगरीय या शहरी पीढ़ी के पास लोक गीत, लोक परंपरा, रीति-रिवाज आदि सभी कुछ धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। लोगों पर विदेशीपन का बुखार चढ़ा हुआ है।

इसके साथ ही हम एक अन्य उदाहरण और रख सकते हैं। गाँवों में पहले और आज भी पड़ोसी, एक दूसरे के दादा-परदादा, रिश्तेदारों को जानते हैं। काम पड़ने पर एक दूसरे की सहायता भी करते हैं। पड़ोसी भी एक दूसरे के बच्चों को डांट-धमका देते हैं। बच्चे घरों में छुपम-छुपाई या अन्य खेल बिना किसी भय के खेल लेते हैं।सभी एक दूसरे के बच्चों को अच्छे से जानते-समझते हैं। नगर और महानगरों में स्थिति इसके विपरित दिखाई देती है। किसी को किसी के बच्चों से कोई लेना-देना नहीं है। सभी अपने को स्वतंत्र समझ रहे हैं। व्यक्ति पड़ोस, गाँव से दूर मैं और मेरे बच्चे का स्वप्न लिए हुए हैं। ऐसे में बच्चों का संस्कारवान होना कहां तक संभव है? अब प्रश्न यह है कि समाज बदल रहा है या हम अपने आप को बदल रहे हैं। महानगरीय या शहरी पीढ़ी के पास लोक गीत, लोक परंपरा, रीति-रिवाज आदि सभी कुछ धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। लोगों पर विदेशीपन का बुखार चढ़ा हुआ है। भाषा, वस्त्र, रहन-सहन सभी कुछ विदेशीपन की चादर ओढ़े हुए हैं।

संस्कृति और संस्कार वह गहना है, जिसकी कोई कीमत नहीं है

ज्ञान पुस्तकों के साथ-साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के साथ रहने से भी आता है। लेकिन हमने विकास की दौड़ में अनुभव की पाठशाला को गाँव में ही अकेला रहने को छोड़ दिया है। संस्कृति और संस्कार वह गहना है, जिसकी कोई कीमत नहीं है। हमारे चाल-चलन, व्यवहार, वाणी, कार्य आदि से ही हमारी पीढ़ियों के बारे में पता चल जाता है। हमारी हर एक कार्यशैली में हमारे संस्कार छिपे हैं। हमारी सरकारों को शहरों, नगरों और महानगरों के साथ-साथ गाँवों में हर एक सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए, जो जन-जन के लिए उपयोगी है। -डॉ. नीरज भारद्वाज

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