ईश्वर चंद विद्यासागर एक महान समाज सुधारक, लेखक, शिक्षाविद् और संस्कृत के विद्वान थे। समाज में क्रांतिकारी बदलाव के लिए उन्होंने कई "भागीरथ" प्रयास किए। भारतीय समाज में महिलाओं की शिक्षा और स्थिति में बदलाव तथा महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के प्रति उनका योगदान उल्लेखनीय है। ईश्वर चंद विद्यासागर ने बहुविवाह, बाल विवाह का सख्त विरोध किया और भारत में विधवा विवाह एवं महिलाओं की शिक्षा का पुरजोर समर्थन किया। तत्कालीन समाज में महिलाओं को शिक्षित करने के लिए उन्होंने मेट्रोपॉलिटन विद्यालय समेत कई लड़कियों के स्कूल खोले। उनके प्रयास के कारण ही 1856 में विधवा विवाह कानून पास हो सका, जिससे विधवाओं के विवाह को कानूनी दर्जा मिला।
विधवा महिलाओं के "मसीहा" कहने जाने ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर सन् 1820 में बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले में एक गरीब परिवार में हुआ था। ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बचपन का नाम ईश्वरचंद्र बंद्योपाध्याय था, लेकिन संस्कृत,बंगला एवं हिंदी साहित्य विभिन्न विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ और ज्ञान के कारण उनके गांवों के लोगों ने उनको विद्यासागर के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। विद्यासागर दो शब्दों से मिलकर बना है विद्या और सागर यानी लोग उनको विद्या का सागर मानते थे। विद्यासागर ने वर्ष 1839 में ही कानून की पढ़ाई पूरी की. 1841 में 21 साल की उम्र में ही वे फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के तौर पर काम करने लग गए।
समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने और समाज में उनकी स्थिति को ठीक करने के लिए विद्यासागर ने बाल विवाह को समाप्त करने और विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
भारत में 19वीं सदी में महिलाओं की स्थिति दकियानूसी परम्पराओं और रीति रिवाजों के नाम पर बहुत ही बुरी थी। उस दौर में महिलाओं का सम्मान तो था पर उन्हें वे अधिकार नहीं मिले थे, जिनकी वे हकादार थीं। यहां बहुत सी ऐसी धार्मिक कुरीतियां प्रचलन में थीं, जो हिंदू समाज के नाम पर कलंक की तरह थी। तब सती प्रथा पर तो कानून बन चुका था, लेकिन बाल विवाह, विधवाओं पर हो रहे अत्याचार बदस्तूर जारी थे। समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने और समाज में उनकी स्थिति को ठीक करने के लिए विद्यासागर ने बाल विवाह को समाप्त करने और विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने दस साल की उम्र में लड़कियों की शादी करने की प्रथा का समर्थन करने वाले धर्म शास्त्रों की कड़ी आलोचना की।
उन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों से विधवा विवाह को वैध प्रमाणित किया। उन्होंने शास्त्रों की छानबीन की और उन्हें पराशर संहिता में वह तर्क मिला जो कहता था कि ‘विधवा विवाह धर्मसम्मत है।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर को विधवा विवाह के प्रणेता के तौर पर भी जाना जाता है। तत्कालीन भारतीय समाज में विद्यासागर ने जब विधवाओं के लिए आवाज उठानी शुरू की तो उन्हें कट्टरपंथियों का विरोध सहना पड़ा। वे चाहते थे कि हर हाल में विधवा महिलाओं की फिर से शादी होनी चाहिए क्योंकि उन्हें भी जीवन जीने का हक है। उन्होंने शास्त्रीय प्रमाणों से विधवा विवाह को वैध प्रमाणित किया। उन्होंने शास्त्रों की छानबीन की और उन्हें पराशर संहिता में वह तर्क मिला जो कहता था कि ‘विधवा विवाह धर्मसम्मत है। विद्यासागर ने तत्कालीन सरकार को एक याचिका दी, जिसमें विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने की मांग की गई थी। उनकी कोशिशें साल 1856 में रंग लाईं जब विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ।
बांग्ला वर्णमाला के पुनर्निर्माण का श्रेय ईश्वर चंद्र विद्यासागर को ही जाता है। उन्होंने संस्कृत स्वरों को समाप्त कर, बांग्ला टाइपोग्राफी को 12 स्वरों और 40 व्यंजनों में तब्दील करते हुए सरल बना दिया।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बालिकाओं की शिक्षा के लिए बहुत प्रयास किए। जिससे उन्होंने आमतौर पर वंचित रखा जाता था। विद्यासागर ने नारी शिक्षा को बढ़ावा देते हुए स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक शृंखला के साथ कलकत्ता में मेट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना की। संस्कृत कॉलेज का प्रिंसिपल बनने के बाद उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिये, जो उस जमाने में बहुत बड़ी बात थी। यही नहीं बांग्ला साहित्य में उनका योगदान अविस्मरणीय है। बांग्ला वर्णमाला के पुनर्निर्माण का श्रेय ईश्वर चंद्र विद्यासागर को ही जाता है। उन्होंने संस्कृत स्वरों को समाप्त कर, बांग्ला टाइपोग्राफी को 12 स्वरों और 40 व्यंजनों में तब्दील करते हुए सरल बना दिया।
गरीबों, दलितों और असहायों की मदद करने के कारण जनता उन्हें 'दयासागर' भी कहा जाता है।
उन्होंने लेखन की दुनिया में बहुत काम करते हुए कालिदास की शकुंतला सहित विभिन्न संस्कृत ग्रंथों का बांग्ला में अनुवाद किया। उनकी रचनाएं ‘उपकारमोनिका’ और ‘ब्याकरण कौमुदी’ खासा लोकप्रिय रहीं। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को गरीबों और दलितों के संरक्षक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने नारी शिक्षा और विधवा विवाह कानून के लिए आवाज उठाई थी। ईश्वर चन्द्र एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। गरीबों, दलितों और असहायों की मदद करने के कारण जनता उन्हें 'दयासागर' भी कहा जाता है। अपनी सहनशीलता, सादगी तथा देशभक्ति के लिए प्रसिद्ध और एक शिक्षाशास्त्री के रूप में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई, 1891 को कोलकाता में हो गया। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर भले ही आज हमारे बीच में नहीं है, लेकिन उनका व्यक्तित्व और कृतित्व समाज में आज भी सुधारों के रूप में आज भी जीवंत है। (युवराज)प्रदीप कुमार वर्मा