पं.दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद 
साहित्य

पं. दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’

जन्मदिन ( 25 सितंबर) पर विशेष

Om Prakash Mishra

भारतीय राजनीतिक चिंतन परंपरा

भारतीय राजनीतिक चिंतन की परंपरा केवल सत्ता, शासन और राज्य की संरचना तक सीमित नहीं रही है। भारतीय मनीषा ने मनुष्य, समाज, प्रकृति और राष्ट्र के बीच संबंधों को एक समग्र दृष्टि से समझने का प्रयास किया है। आधुनिक भारत में पं. दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’ इसी दीर्घ भारतीय चिंतन-परंपरा को आधुनिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में पुनर्व्याख्यायित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने ऐसी विकास-दृष्टि प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जिसमें मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी न मानकर उसके शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित रूप में देखा गया।

उनके अनुसार पश्चिमी राजनीतिक विचारों में व्यक्ति को प्रायः आर्थिक, सामाजिक अथवा राजनीतिक इकाई के रूप में देखा गया, जबकि भारतीय दृष्टि मनुष्य को उसके समग्र अस्तित्व के साथ स्वीकार करती है।

एकात्म मानववाद की वैचारिक आवश्यकता

बीसवीं शताब्दी के मध्य में विश्व की राजनीति मुख्यतः दो प्रमुख वैचारिक ध्रुवों-पूँजीवाद और साम्यवाद-के बीच विभाजित थी। पूँजीवादी व्यवस्था व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता और बाजार को प्राथमिकता देती थी, जबकि साम्यवादी चिंतन आर्थिक समानता और वर्ग-संघर्ष को सामाजिक परिवर्तन का आधार मानता था। दीनदयाल उपाध्याय को दोनों व्यवस्थाओं में मनुष्य के अधूरे चित्र की समस्या दिखाई देती थी। उनके अनुसार पश्चिमी राजनीतिक विचारों में व्यक्ति को प्रायः आर्थिक, सामाजिक अथवा राजनीतिक इकाई के रूप में देखा गया, जबकि भारतीय दृष्टि मनुष्य को उसके समग्र अस्तित्व के साथ स्वीकार करती है। यहीं से एकात्म मानववाद की वैचारिक आवश्यकता सामने आती है। इसका उद्देश्य पश्चिमी विचारधाराओं को मात्र अस्वीकार करना नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि के आधार पर मनुष्य और समाज के प्रश्नों का अपना उत्तर विकसित करना था।

उनकी दृष्टि में विकास का अर्थ केवल उत्पादन और उपभोग में वृद्धि नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का संतुलित विकास है। भौतिक समृद्धि आवश्यक है, किंतु उसके साथ नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक संतुलन भी आवश्यक हैं।

मनुष्य केवल शरीर नहीं

एकात्म मानववाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष मनुष्य की समग्र अवधारणा है। दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार मनुष्य केवल शरीर नहीं है। उसके अस्तित्व में शरीर के साथ मन, बुद्धि और आत्मा भी सम्मिलित हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था जो केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, उसे पूर्ण मानवीय व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। उनकी दृष्टि में विकास का अर्थ केवल उत्पादन और उपभोग में वृद्धि नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का संतुलित विकास है। भौतिक समृद्धि आवश्यक है, किंतु उसके साथ नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक संतुलन भी आवश्यक हैं। इस प्रकार एकात्म मानववाद विकास की एक ऐसी अवधारणा प्रस्तुत करता है जिसमें आर्थिक प्रगति को मानवीय मूल्यों से अलग नहीं किया जाता।

दीनदयाल उपाध्याय भारतीय दृष्टि के आधार पर इन दोनों के बीच समन्वय स्थापित करना चाहते थे। उनके लिए व्यक्ति समाज से अलग कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है।

व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक दायित्व

एकात्म मानववाद व्यक्ति और समाज के बीच संघर्ष के बजाय परस्पर पूरकता को स्वीकार करता है। पश्चिमी चिंतन की कुछ धाराओं में व्यक्ति को समाज के केंद्र में रखा गया, जबकि कुछ में समाज या वर्ग को व्यक्ति से अधिक महत्व मिला। दीनदयाल उपाध्याय भारतीय दृष्टि के आधार पर इन दोनों के बीच समन्वय स्थापित करना चाहते थे। उनके लिए व्यक्ति समाज से अलग कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है। परिवार, समुदाय, राष्ट्र और व्यापक मानवता उसके विकास के स्वाभाविक स्तर हैं। इसलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक दायित्व दोनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है। यही विचार आगे चलकर ‘सामाजिक समरसता’ और ‘अंत्योदय’ जैसी अवधारणाओं से जुड़ता है।

वे राष्ट्र को एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखते हैं। उनकी राष्ट्र-दृष्टि में ‘चिति’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसे राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक चेतना अथवा आत्मा के रूप में समझा जा सकता है। इस दृष्टि से राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि समाज को एक साझा सांस्कृतिक बोध से जोड़ने वाली शक्ति है।

राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई

दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमा या प्रशासनिक इकाई नहीं है। राष्ट्र का निर्माण साझा सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति और जीवन-मूल्यों से होता है। वे राष्ट्र को एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखते हैं। उनकी राष्ट्र-दृष्टि में ‘चिति’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसे राष्ट्र की मूल सांस्कृतिक चेतना अथवा आत्मा के रूप में समझा जा सकता है। इस दृष्टि से राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि समाज को एक साझा सांस्कृतिक बोध से जोड़ने वाली शक्ति है। यह विचार आधुनिक भारतीय राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे राष्ट्रवाद को केवल राज्य-केंद्रित अवधारणा के बजाय सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ में समझने का आधार मिलता है।

अंत्योदय की भावना

एकात्म मानववाद का आर्थिक पक्ष भी उल्लेखनीय है। दीनदयाल उपाध्याय ऐसी अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे जिसमें आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुख-सुविधाओं और अवसरों की पहुँच सुनिश्चित करना हो। यही दृष्टि ‘अंत्योदय’ की भावना से जुड़ती है। उनके अनुसार विकास की सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीय आय या उत्पादन के आँकड़ों से नहीं किया जाना चाहिए। यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में कितना परिवर्तन आया। इस दृष्टि से अंत्योदय भारतीय विकास-दर्शन को मानवीय संवेदना से जोड़ता है। आज जब विकास, सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता और कल्याणकारी राज्य जैसे प्रश्न राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं, तब दीनदयाल का यह पक्ष विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है।

आर्थिक व्यवस्था और मानवीय गरिमा

दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्थानीय आवश्यकताओं पर भी बल देता है। उनके लिए अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल अधिकतम उत्पादन और उपभोग नहीं था। आर्थिक व्यवस्था को समाज की वास्तविक आवश्यकताओं, स्थानीय संसाधनों और मानवीय गरिमा से जुड़ा होना चाहिए। इस संदर्भ में उनके विचारों को आज के ‘आत्मनिर्भरता’ और स्थानीय अर्थव्यवस्था के विमर्श से जोड़कर देखा जा सकता है।

आधुनिकता का अर्थ

एकात्म मानववाद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि वह भारतीय परंपरा को अतीत की स्मृति बनाने के स्थान पर आधुनिक समस्याओं के समाधान के लिए उससे वैचारिक आधार ग्रहण करने का प्रयास करता है। दीनदयाल उपाध्याय ने धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, समाज और व्यक्ति जैसी पारंपरिक भारतीय अवधारणाओं को आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में पुनर्स्थापित किया। उनकी दृष्टि में आधुनिकता का अर्थ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विच्छेद नहीं है। भारत आधुनिक विज्ञान, तकनीक और लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्वीकार करते हुए भी अपने समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक चेतना को बनाए रख सकता है। इसीलिए एकात्म मानववाद को भारतीय आधुनिकता की एक वैकल्पिक अवधारणा के रूप में भी देखा जा सकता है।

एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता

आज के समय में एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए उसके राजनीतिक उपयोग और दार्शनिक मूल्यों के बीच अंतर करना आवश्यक है। एक विचारक के रूप में उनका मूल्यांकन केवल राजनीतिक दलगत संदर्भ में सीमित करना उनके चिंतन की व्यापकता को कम कर देगा। आज पर्यावरणीय संकट, आर्थिक असमानता, सामाजिक विखंडन, उपभोक्तावाद और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ विकास के प्रचलित मॉडलों पर पुनर्विचार की आवश्यकता पैदा करती हैं। ऐसे समय में मनुष्य को केवल उपभोक्ता न मानकर उसके समग्र व्यक्तित्व और प्रकृति के साथ उसके संबंध को महत्व देने वाली दृष्टि पर पुनर्विचार उपयोगी हो सकता है।

एकात्म मानववाद की सार्थकता इस बात में है कि वह विकास को मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ता है।

निष्कर्ष

पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद भारतीय चिंतन को आधुनिक परिस्थितियों में पुनर्परिभाषित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इसकी मूल शक्ति इस विचार में निहित है कि व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति को परस्पर विरोधी इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए जीवन-तंत्र के रूप में समझा जाए। एकात्म मानववाद की सार्थकता इस बात में है कि वह विकास को मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ता है। यद्यपि इसके विभिन्न पक्षों की आलोचनात्मक समीक्षा और समकालीन संदर्भ में पुनर्व्याख्या आवश्यक है, फिर भी यह भारतीय राजनीतिक चिंतन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान करता है। आज आवश्यकता न तो इसके अंध-समर्थन की है और न ही पूर्वाग्रहपूर्ण अस्वीकृति की; बल्कि इसके मूल सिद्धांतों का गंभीर, तर्कपूर्ण और आलोचनात्मक पुनर्पाठ ही इसे भारतीय चिंतन की आधुनिक यात्रा में सार्थक स्थान प्रदान कर सकता है।

आलेख - डॉ. अभिजीत सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विद्यासागर कॉलेज फॉर विमेन, कोलकाता
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