कविता/दहेज Ai
साहित्य

दहेज

कविता

बहुत कुछ है देने को बाबा दहेज के अलावा,

मैं तो तेरे घर की लक्ष्मी हूँ न कि चढ़ावा।


सबसे पहले देना जीवन जब कोख में हो लाली,

मेरे पैदा होने पर भी बजाना काँसे की थाली।

सुंदर नैन नक़्श देना न देना पर देना रीढ़ की हड्डी,

सीधी खड़ी रह सकूँ जब जिंदगी पछाड़े ज्यूँ कबड्डी।

फिर देना दहेज़ में लिखाई पढ़ाई भर भर बस्ता,

भरूँ उड़ान न करना पड़े सपनों से समझौता।

आँखों की पुतली को देना हाथों में हिम्मत,

जो ना कह सकूँ जब उछाली जाए इज़्ज़त।

पल्लू में बांध कर देना आवाज उठाने के हौसले,

जो तोड़ सकूँ दम घोटते रूढ़ियों के ढकोसले।

देना है तो देना दिलासा कि तू है पीछे खड़ा,

घर लौट आऊँ जब हो जीना नामुमकिन बड़ा।

गठरी में बाँध कर देना भरोसा भर भर के,

नदी नहीं जो लौट न सकूँ अपने मायके।

चार लोग क्या कहेंगे जो तू घर लौटी,

क्या मंजूर है तुम्हें चार काँधे पर जाती बेटी।

रेखा ड्रोलिया
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