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साहित्य

शांति के फलक पर मुस्कुराते प्रगति के चित्र

21 सितम्बर अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस

Om Prakash Mishra
शांति के अभाव में जीवन नीरसता, अनुत्साह एवं नैराश्य के सघन अंधकार में उद्देश्यरहित हो पथभ्रांत पथिक की भांति भटकता रहता है।

वैयक्तिक एवं वैश्विक सुख, समृद्धि एवं संतुष्टि का आधार शांति है। शांति के अभाव में जीवन नीरसता, अनुत्साह एवं नैराश्य के सघन अंधकार में उद्देश्यरहित हो पथभ्रांत पथिक की भांति भटकता रहता है। युद्ध, हिंसा, अराजकता एवं वैमनस्यता की कलुष कुविचार परिधि में सीमित हुआ मन लोकहित एवं लोकोत्कर्ष के मानवीय वितान की सर्जना से विमुख हो जाता है। व्यक्ति, परिवार एवं समाज के विकास एवं विस्तार के लिए आवश्यक है कि मनसा, वाचा, कर्मणा मानवीय व्यवहार एवं व्यवस्था परिमार्जित हो एवं सुखदायक भी। भारतीय वांग्मय वसुधैव कुटुम्बकं का उद्घोष करते हुए दैहिक, दैविक एवं भौतिक कष्टों से मुक्ति तथा पंच महाभूत तत्वों आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी सहित औषधि, वनस्पति, उपवन, कानन, ग्राम, नगर, समस्त प्राणियों एवं चराचर जगत के कण-कण में शांति की कामना करता हुआ दैनंदिन लोकजीवन में वैदिक शांति पाठ का वाचन करता है -

ॐ द्यौ: शांतिरन्तरिक्ष शांति: पृथिवी शांति: शान्तिराप: शांतिरोषधय: शांतिर्वनस्पतय: शांतिर्विश्वेदेवा: शांतिर्ब्रह्मशांति: सर्व शांति: शांतिरेव शांति: सामाशांतिरेभि: ओम शांति: ओम शांति: ॐ शांति:।

वैश्विक पटल पर जहां शिक्षा, संस्कृति, संगीत, साहित्य, संस्कार एवं सम्बंधों के समन्वय से उपजे सुखद सुवासित सुमधुर सरस मनोहारी उपवन लहलहाने चाहिए थे; वहां मिसाइलें और तोपें गरज रही हैं, बमों से धरा का अंग-प्रत्यंग क्षत-विक्षत हो रहा है और बारूद की दुर्गंध से फेफड़े भर गये हैं, धूल-धुआं से नेत्र शुष्क हो गये हैं।

लेकिन व्यक्ति एवं विश्व अशांत है। युद्ध, रक्तपात, हिंसा, तनाव, अवसाद एवं आतंकवाद की विभीषिका में कैद मानवता कराह रही है। वैश्विक पटल पर जहां शिक्षा, संस्कृति, संगीत, साहित्य, संस्कार एवं सम्बंधों के समन्वय से उपजे सुखद सुवासित सुमधुर सरस मनोहारी उपवन लहलहाने चाहिए थे; वहां मिसाइलें और तोपें गरज रही हैं, बमों से धरा का अंग-प्रत्यंग क्षत-विक्षत हो रहा है और बारूद की दुर्गंध से फेफड़े भर गये हैं, धूल-धुआं से नेत्र शुष्क हो गये हैं। मानव एवं प्रकृति कराह रहे हैं। और जब यह करुण पुकार संयुक्त राष्ट्रसंघ के कर्ण गह्वर से टकराईं तो उपाय एवं रास्ता मिलना ही था। दुनिया में शांति, अहिंसा और पारस्परिक सद्भाव एवं बंधुत्व के लिए संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के रूप में एक वैश्विक आयोजन की कार्य योजना प्रस्तावित कर इस दिन को अहिंसा, शांति और युद्ध विराम दिवस के रूप में घोषित किया है। संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा ने दुनिया में शांति, संवाद, सहयोग और समझ को बढ़ावा देने हेतु वर्ष 1981 में अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के आयोजन का प्रस्ताव दिया और वर्ष 1982 से यह दिवस सितम्बर महीने में मनाया जाने लगा। वर्ष 2001 से अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के आयोजन की तिथि 21 सितम्बर निश्चित की गई। इस दिन संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में शांति की घंटी बजाई जाती है जो हिंसा एवं युद्ध में मानवता की हानि का स्मरण कराती है। वर्तमान वर्ष का आयोजन विशेष थीम 'शांति में निवेश करें- सभी के लिए, हर जगह, हर दिन' विषय पर केंद्रित है।

दुनिया में शांति स्थापित कर सौहार्द का परिवेश रचने हेतु संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1948 में युद्धग्रस्त देशों में शांति सैनिकों की तैनाती का कदम उठाया। आज तक 70 से अधिक सैन्य अभियानों के माध्यम से हिंसा एवं युद्धग्रस्त क्षेत्रों में सैन्यकर्मियों, चिकित्सकों, पशु-चिकित्सकों, नर्सों, अध्यापकों, इंजीनियरों एवं मानवाधिकार अधिकारियों के रूप में 20 लाख से अधिक व्यक्तियों ने शिक्षा, सेवा, पुनर्वास, सड़क निर्माण, परिवहन, औषधि वितरण, वृक्षारोपण, रेडियो प्रसारण, चिकित्सालय निर्माण एवं भोजन प्रबंध में शांति मिशनों में योगदान दिया है। उल्लेखनीय है संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांति सैनिक बल को 1988 में शांति क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। जरूरत है कि परिवार एवं समाज सामुदायिक सहयोग विचार भाव से जीवन यापन कर शांति की आराधना करें तथा दुनिया के समस्त देश संयुक्त राष्ट्रसंघ के पीस चार्टर के प्रावधानों, अंतरराष्ट्रीय एवं द्विपक्षीय शांति संधियों का पालन कर संवाद के रास्ते पर चलते हुए अंतरराष्ट्रीय शांति रक्षा अभियान, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सहयोग कर शांति के वितान पर मानवता के खिलखिलाते पुष्पों का अंकन करें।

जरूरत है कि परिवार एवं समाज सामुदायिक सहयोग विचार भाव से जीवन यापन कर शांति की आराधना करें तथा दुनिया के समस्त देश संयुक्त राष्ट्रसंघ के पीस चार्टर के प्रावधानों, अंतरराष्ट्रीय एवं द्विपक्षीय शांति संधियों का पालन कर संवाद के रास्ते पर चलते हुए अंतरराष्ट्रीय शांति रक्षा अभियान, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सहयोग कर शांति के वितान पर मानवता के खिलखिलाते पुष्पों का अंकन करें।
महाभारतकार संतोष को परम सुख, तृष्णा को महारोग, दया को परम धर्म तथा शांति को सर्वोत्कृष्ट तप बताते हुए समाधान देते हैं- शांतिर्तुल्यं तपोनास्ति, न संतोषात् परंसुखम्। न तृष्णाया: परोव्याधि:, न च धर्मों दयापर:।

विचारणीय विषय है कि परिवारों में अशांति एवं वैमनस्यता क्यों पसरी हुई है तथा दुनिया युद्ध और हिंसा के चक्रव्यूह में क्यों फंसी हुई है ? युद्ध, हिंसा, रक्तपात, अशांति, वैमनस्यता एवं कटुता-कलुषता की कारा से मुक्त होने की कोई डगर बची भी है या समाधान के समस्त पथ अवरुद्ध हो चुके हैं। इन ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर हमारे मन-मस्तिष्क में अंकित हैं, पर हम ऋषियों की अमरवाणी पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे। महाभारतकार संतोष को परम सुख, तृष्णा को महारोग, दया को परम धर्म तथा शांति को सर्वोत्कृष्ट तप बताते हुए समाधान देते हैं- शांतिर्तुल्यं तपोनास्ति, न संतोषात् परंसुखम्। न तृष्णाया: परोव्याधि:, न च धर्मों दयापर:। पर चाहे वह व्यक्ति हों या देश, सभी तृष्णा के पीछे विवेकहीन होकर भाग रहे हैं। सहज प्राप्त संसाधनों की सुख-सविधा में संतुष्ट न होकर अप्राप्त की प्राप्ति की मृगतृष्णा में फंसा हुआ है। इसी कारण परिवारों में भाई-भाई में टकराव है और एक देश का दूसरे देश से।

प्रकृति ने समस्त प्राणियों के पोषण एवं जीवन निर्वाह हेतु पर्याप्त संपदा सौंपी हुई है किंतु हम अपने हिस्से में संतुष्ट न होकर दूसरे का हिस्सा हड़पना चाहते हैं।

प्रकृति ने समस्त प्राणियों के पोषण एवं जीवन निर्वाह हेतु पर्याप्त संपदा सौंपी हुई है किंतु हम अपने हिस्से में संतुष्ट न होकर दूसरे का हिस्सा हड़पना चाहते हैं। अपने लिए अधिकाधिक संसाधन जुटा लेना चाहते हैं, तरीका धमकाने-डराने का हो या फिर प्रकट युद्ध एवं हिंसा-रक्तपात का। अशांति, अस्थिरता एवं अनुशासनहीनता मानसिक विकृति का परिणाम है। अशांत मन को कहीं सुख नहीं मिलता और न ही ठहराव।

नीति कहती है, प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। पर हमारी भाषा तो कटुता-क्लेश परोस रही है।

श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण मार्गदर्शन करते हैं- अशांतस्य कुत: सुखं। पर उन्माद के बहाव में कोई सुनने-समझने को तैयार नहीं हैं। नीति कहती है, प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। पर हमारी भाषा तो कटुता-क्लेश परोस रही है। मुझे लगता है कि यदि दुनिया में शांति, अहिंसा, प्रेम-सद्भाव एवं पारस्परिक बंधुत्व भाव के सकारात्मक आनंदमय वातावरण की रचना करनी है तो इस कल्याण मंत्र के भाव को हृदयंगम कर आचरण में लाना होगा, तभी विश्व शांति के फलक पर प्रगति के सप्तवर्णी रंग मुस्कुराते हुए वैश्विक सुख, संतुष्टि एवं समृद्धि के आसन पर सुशोभित होंगे-

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे भवन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत।।

ॐ शांति: शांति: शांति:

-प्रमोद दीक्षित ʺमलयʺ

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