पिघलते हिमालय के ग्लेशियर पर 22 करोड़ लोग निर्भर

लंदनः पिघलते हिमालय के ग्लेशियर अब लोगों के लिए वरदान बन गए हैं। ये करीब 22 करोड़ लोगों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं। हालांकि दूसरी ओर इसका नुकसान भी है। दरअसल, ग्लेशियरों का पानी एशिया की कुछ बड़ी नदी घाटियों में मिल जाता है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन उन क्षेत्रों के लिए सामाजिक एवं आर्थिक रूप से मायने रखता है जिनके सूखे की चपेट में आने की आशंका रहती है। जलवायु परिवर्तन के कारण क्षेत्र के ज्यादातर ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
ब्रिटेन के ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण (बीएएस) के ग्लेशियर वैज्ञानिक हैमिश प्रिटचार्ड ने कहा कि पिघली बर्फ का पानी निचले इलाकों में रह रहे लोगों के लिए आवश्यक हो जाता है जब बारिश नहीं होती या पानी की अत्याधिक कमी हो जाती है। इस तरह का एक अध्ययन एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार गर्मी के मौसम में ग्लेशियर 36 क्यूबिक किलोमीटर पानी छोड़ते हैं जो एक करोड़ 40 लाख ओलंपिक स्वीमिंग पूल के पानी के बराबर है। इतना पानी 22 करोड़ लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है।

आने वाले समय में होगा इसका नुकसान
एशिया क्षेत्र में उच्च हिमालयी क्षेत्रों को तीसरे ध्रुव के रूप में जाना जाता है यहां कुछ 95 हजार ग्लेशियर मौजूद है। हर साल बर्फबारी के बाद ग्लेशियरों का 1.6 गुना पानी पिघल जाता है।
ग्लेशियर वैज्ञानिक हामिश ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हालात ये हैं कि एशिया के उच्च हिमालय भी खतरे में है। अध्ययन में ये भी पता चला है कि पानी के प्राकृतिक भंडार के रूप में ये समाज के लिए काफी मूल्यवान है। ये चीजें गर्मियों में नदियों को लंबे समय तक सूखने से रोकता है। उनका कहना है कि यदि इसी तरह से चलता रहा तो सूखे के कारण पानी और भोजन की आने वाले समय में कमी हो जाएगी।

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