किडनी की समस्या का आयुर्वेद में है इलाज, पढ़ें

नई दिल्ली : किडनी शरीर का महत्वपूर्ण अंग है और फिल्टर माना जाता हैं, यह हमारे शरीर में मौजूद टॉक्सिन को बाहर निकालने का काम करती है। किडनी का मुख्य काम शरीर में मौजूद ब्‍लड की सफाई करना है। हमारी दोनों किडनी में छोटे-छोटे लाखों फिल्टर होते हैं, जिन्हें मेडिकल भाषा में नेफ्रोंस कहा जाता है। नेफ्रोंस हमारे ब्लड को साफ करते हैं, साथ ही ब्लड में मौजूद हानिकारक तत्व यूरिन के जरिये शरीर से बाहर कर देते हैं।

किडनी रेड ब्लड सेल्स का बनाती है और फायदेमंद हार्मोंस रिलीज करती है। किडनी द्वारा रिलीज किए गए हार्मोंस द्वारा ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है और साथ ही किडनी हमारे शरीर में मौजूद हड्डियों को विटामिन डी पहुंचाने का काम भी करती है। साथ ही शरीर में पानी और अन्य जरूरी तत्व जैसे मिनरल्स, सोडियम, पोटेशियम और फॉस्फोरस का ब्लतड में बैलेंस बनाए रखने में किडनी का जरूरी योगदान होता है। ऐसे में किडनी की अच्छेम से देखभाल करनी चाहिए।

किडनी की बीमारी आज बड़ी बन चुकी है और पिछले कुछ सालों से इसमें इजाफा हुआ है। एक स्टडी के मुताबिक देशभर में करीब 14 प्रतिशत महिलाएं और 12 प्रतिशत पुरूष किडनी की समस्या जूझ रहे हैं, किडनी की बीमारी बहुत बढ़ चुकी है। किडनी से जुड़ी समस्याएं विकराल हो चुकी है और लोग डॉक्टर के पास तब जाते हैं, जब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है। हालांकि आयुर्वेद में भी किडनी की बीमारी का इलाज है। आयुर्वेद की दवा किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले घातक तत्वों को भी बेअसर करती है।

कोलकात्ता में चल रहे भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान मेले में पहली बार आयुर्वेद दवाओं पर एक विशेष सेशन का आयोजन किया गया, जिसमें किडनी के ट्रीटमेंट में इसके प्रभाव पर चर्चा की गई। इस सेशन के दौरान एमिल फार्मास्युटिकल के कार्यकारी निदेशक संचित शर्मा ने आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट में प्रभावी दवा नीरी केएफटी के बारे में अब तक हुए शोधों का ब्यौरा पेश करते हुए कहा कि नीरी केएफटी किडनी में टीएनएफ अल्फा के लेवल को नियंत्रित करती है। टीनएफ एल्फा परीक्षण से ही किडनी में हो रही गड़बड़ियों का पता चलता है तथा यह सूजन आदि की स्थिति को भी दर्शाता है। टीएनएफ अल्फा सेल सिग्नलिंग प्रोटीन है।

संचित शर्मा ने अपने प्रजेंटेशन में कहा कि नीरी के एफटी को लेकर अमेरिकन जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च में शोध प्रकाशित हो चुका है। शोध में जिन समूहों को रेगुलर नीरी केएफटी दवा दी जा रही थी, उनकी किडनी सही तरीके से काम कर रही थी। उनमें भारी तत्वों, मेटाबोलिक बाई प्रोडक्ट जैसे क्रिएटिनिन, यूरिया, प्रोटीन आदि की मात्रा कंट्रोल पाई गई। जिस समूह को दवा नहीं दी गई, उनमें इन तत्वों का प्रतिशत बेहद ऊंचा था। यह पांच बूटियों पुनर्नवा, गोखरू, वरुण, पत्थरपूरा तथा पाषाणभेद से तैयार की गई है।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद में कई उपयोगी दवाएं हैं। उन बीमारियों का उपचार है, जिनका एलोपैथी में नहीं है, लेकिन उन्हें आधुनिक चिकित्सा की कसौटी पर परखे जाने और प्रमाणित किये जाने की जरूरत है। डीआरडीओ और सीएसआईआर ने इस पर काम किया है, इस पर और ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

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