त्वचा की बीमारियां व बचाव

पैरों का फटना :- हम चेहरे, बाल तथा हाथों पर जितना ध्यान देते हैं उतना अपने पैरों की देखभाल पर नहीं जिसका परिणाम होता है कि हमारे पैर तथा एड़ियां खुरदरी, काली तथा फटी रह जाती हैं। पैरों तथा एड़ियों के फटने के कई कारण हैं। स्नान के समय हम पैरों की सफाई पर ध्यान नहीं देते जिसके कारण पैरों पर मैल एकत्र होकर रक्त के संचार को रोक देता है जिससे एड़ियों में दरारें पड़ जाती हैं। धूल, गर्दा, मिट्टी तथा पानी आदि मिलकर स्थान-स्थान पर उनको कटा-फटा बना देती हैं।
शीतकाल में एड़ियां शुष्क वायु तथा शरीर में चिकनाई के अभाव के कारण फटती हैं। गर्मी के दिनों में आंतरिक गर्मी के कारण एडिय़ों में फटन आती है। कैल्शियम के अभाव से भी पैर तथा एड़ियां काली होती हैं और फटती हैं।
त्वचा का फटना :- गर्मियों में नमी ज्यादा होती है इसलिए त्वचा मुलायम रहती है। जाड़े में त्वचा का पानी सूख जाता है। पानी की कमी से त्वचा फटने लगती है। हर त्वचा की प्रकृति अलग होती है। तैलीय त्वचा की अपेक्षा रूखी त्वचा का रूखापन सर्दियों में और बढ़ जाता है जिससे त्वचा को नुकसान पहुंचता है। इसके लिए तेल की मालिश बहुत लाभकारी होती है।
जाड़े में अगर त्वचा की देखभाल न की जाए तो अनेक रोग पनप सकते हैं। त्वचा की अनेक बीमारियां सिर्फ सर्दियों में ही हुआ करती हैं।
इकथियोसिस :- त्वचा की यह बीमारी गर्मियों में तो ठीक रहती है मगर सर्दियों में उभर आती है। यह पैदायशी बीमारी है। इसमें त्वचा अत्यधिक रूखी हो जाती है। खुश्की से त्वचा फट जाती है और खुजली महसूस होती है। यदि जाड़े में ऐसी परेशानी होती है तो स्थान परिवर्तन से लाभ हो सकता है। अगर स्थान परिवर्तन संभव न हो तो नारियल के तेल की नियमित मालिश बहुत फायदेमंद रहती है।
डर्माटाइटिस :- घरेलू औरतें आमतौर पर पानी का काम ज्यादा करती हैं मसलन कपड़े धोना, बर्तन मांजना, पोछा लगाना इत्यादि। जाड़े के दिनों में पानी में ज्यादा रहने से खून का दौरा कम हो जाता है और हाथ पैर की अंगुलियां सूज जाती हैं। इस रोग को डर्माटाइटिस कहते हैं। ठंड से बचाव करने पर यह रोग नियंत्रण में रहता है। इसके लिए कोल्ड क्रीम का उपयोग भी लाभकारी होता है।
चिलब्लेंस :- यह रोग अत्यधिक ठंडे स्थान और बर्फ गिरने वाले प्रदेशों में ज्यादा होता है। इसमें अंगुलियां सुन्न पड़ जाती हैं, सूज जाती हैं और लाल हो जाती हैं। यह बेहद तकलीफदेह रोग है। धूप का नियमित सेवन और गर्म तेल का सेंक इसका सबसे उपयुक्त उपचार है।
खुजली :- कुछ लोग जाड़े में नहाने से कतराते हैं और कई कई दिनों तक नहीं नहाते। न नहाने से खुश्क त्वचा पर मैल जमा होकर गंदगी के दाने बन जाते हैं जिनमें असहनीय खुजली शुरू होने लगती है। यह एक संक्रामक रोग है। यह त्वचा की गंदगी से पनपती है। इससे मुक्ति का उपाय है नियमित स्नान और तेल की मालिश। मालिश के लिए सरसों, नारियल या जैतून, कोई भी तेल ले सकते हैं। तेल को हल्का गर्म करके इस्तेमाल करें।
त्वचा के रोगों से बचाव
– सर्दी के मौसम में स्वस्थ त्वचा के लिए जरूरी है नियमित स्नान। भले ही आप प्रतिदिन न नहाएं परन्तु हर दूसरे दिन नहाने का नियम बनाएं। जिस दिन नहीं नहाएं, उस दिन स्पंज करें तथा अंदर के कपड़े अवश्य बदलें। नहाने के लिए ठंडा-गर्म जैसा पानी चाहें, इस्तेमाल कर सकते हैं।
– जाड़े में साबुन का उपयोग ज्यादा न करें। नहाने से पहले पूरे बदन में तेल लगाएं। नहाने के बाद तेल या माश्चराइजर का उपयोग करें। पानी से करने वाले काम एक ही बार में निपटा लें। बार-बार पानी में हाथ न डालें। यदि पानी का काम करना जरूरी है तो पहले हाथों में मलाई लगाएं। दस्ताने पहन कर काम करने से त्वचा सुरक्षित रहती है।
– सर्दियों में धूप का नियमित सेवन करके चिलब्लेंस व डर्माटाइटिस जैसे रोगों से बचा जा सकता है। धूप में उतनी ही देर बैठें, जितनी देर आराम महसूस करें। अगर त्वचा लाल पड़ने लगे या सूजने लगे, तो धूप से हट जाएं। जिन्हें धूप से एलर्जी है उनके लिए सर्दी की धूप भी नुकसानदायक है। ऐसे लोग धूप में कम निकलें। जब भी धूप में निकलें तो सिर पर स्कार्फ बांध लें या छतरी भी लगा सकते हैं।
– हाथ-पैर की अंगुलियों के सुन्न होने, खून का दौरा कम होने या त्वचा के फटने से बचाने का सबसे अच्छा उपाय है संतुलित आहार। भोजन में दूध, दही और हरी सब्जियां खूब लें। विटामिन ए ज्यादा से ज्यादा लें। त्वचा के लिए गाजर का सेवन बहुत फायदेमंद है।
– यूरिया आयंटमेंट त्वचा के फटने, सूजन और लाल होने वाली त्वचा के उपचार के लिए बहुत उपयोगी है। यह यूरिया से बनती है। इसको मलने से त्वचा काफी देर तक मुलायम बनी रहती है। इसके नियमित इस्तेमाल से त्वचा में होनेवाले रोगों से बचा जा सकता है तथा त्वचा स्वस्थ रहती है।

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