सीमित भले ही हो सांस,नहीं थमेगी हमारी उड़ान

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हर व्यक्ति अपनी खुशहाल जिदंगी की कामना करता है। आज की बदलती जीवनशैली और भाग दौड़ भरी जिंदगी में खुशहाली किसी वरदान से कम नहीं है। एक स्वस्‍थ्य जीवन के लिए हम क्या-क्या नहीं करते? पौष्टिक आहार, कसरत,योगा,व्यायाम कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। लेकिन क्या आपने कभी उन लोगों के बारे में विचार किया है जिनसे जीने की उम्मी‍द ही छिन हो गयी है। जरा सोचिए उन लोगों के बारे में जिन्हें जांच के बाद पता चले कि उन्हें एचआईवी है। एचआईवी का पता लगना जीवन के सबसे कठिन अनुभवाें में से एक है और इसमें मौत का डर हमेशा बना रहता है।। इस वर्ल्ड एड्स डे पर मिलिए इन रियल लाइफ हीरोज से जिन्हें एचआईवी भी लंबे,खुशहाल और संतुष्ट जीवन से नहीं रोक पाई। इन बहादुरों का कहना है कि सही उपचार और अपनों के सहयोग के साथ लंबे समय तक जीना संभव है। आइए जाने उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी

मैने एचआईवी को अपने जीवन के एक हिस्से के रूप में स्वीकारा : अजीमा

मैं केवल सात महीने की थी जब मेरी मां मुझे अस्पताल में छोड़कर चली गयी। डॉक्टरों का कहना था कि मैं ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहूंगी। अस्पताल में रहने के दौरान मुझे खून चढ़ाया गया था जिस वजह से मुझे एचआईवी हो गया। मेरे मां-बाप के जाने के बाद मेरी दादी ने ही मेरा ख्याल रखा। यह कहना है 16 वर्षीय अजीमा का जो एचआईवी को लेकर लोगों की धारणाओं को बदलने की उम्मीद रखती है। अजीमा ने कहा ” मैं 9 साल की थी जब मुझे पता चला कि मुझे एचआईवी है। बीमारी का पता लगने के बाद मैंने एचआईवी के लिए एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) लेना शुरू कर दिया। मैंने इसे अच्छी तरह से स्वीकार किया लेकिन दुर्भाग्य‍वश एक समय के बाद मेरे शरीर में ग्रोथ बंद हो गयी। मुझे एक नयी दवा दी गई लेकिन इससे मेरे चलने की क्षमता प्रभावित हुई। मैंने सभी से बात करना बंद कर दिया था। मैं काफी चुपचाप और अकेली रहने लगी थी।

कुछ समय बाद मेरी दादी को यूनीसेफ द्वारा संचालित एचआईवी वाले बच्चों के लिए एक केंद्र के बारे में पता चला। दरअसल,केंद्र में मौजूद समूह एचआईवी पीड़ित बच्चों की देख-रेख करते है और उन्हें बेहतर जीवन प्रदान करने की हर संभव कोशिश करते हैं। अजीमा ने आगे कहा “मैं हर तीन महीने में यूनीसेफ केंद्र जाने लगी और वहां मैनें पहली बार खुलकर लोगों से एचआईवी के बारे में बात की। मुझे लगा मैं फिर से जीवन से जुड़ने लगी हूं।

उसने कहा ”मैं एचआईवी पीड़ित बच्चों के प्रति लोगों की साेच में बदलाव लाना चाहती हूं जिसके लिए मैंने यूनीसेफ की मदद से चैरिटी फेयर में भाग लिया। फेयर में मैं एक बाेर्ड लेकर खड़ी थी जिस पर लिखा था ”मैं एचआईवी पॉजिटिव हूं। मुझे गले लगाओ!”

मुस्कुराते हुए अजीमा ने कहा ”मुझे बेहद खुशी हुई जब सैकड़ों लोग रुके और मुझे गले लगाया। पिछले साल मैने टीवी और रेडियो पर एचाआईवी के साथ जीने पर एक वीडियो प्रसारित किया जिसके बाद मुझे लोगों के समर्थन के कई संदेश मिले। सबसे ज्यादा खुशी की बात तो यह है कि इस शो में कुछ बच्चों ने भी भाग लिया।”

मैने एचआईवी को अपने जीवन के एक हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है। अजीमा का मानना है कि अगर ज्यादा से ज्यादा लाेग एचआईवी देखभाल केंद्र के बारे में जान पाएंगे तो एचआईवी को एक समस्या के रुप में नहीं देखेंगे।

एचआईवी पॉजिटिव होना दुनिया का अंत नहीं : महंत माले

एचआईवी पॉजिटिव होना दुनिया का अंत नहीं है। इस बात का आभास मुझे कुछ काउंसलिंग सेशन ने कराया। यह मानना है 20 वर्षीय महंत माले का। महंत ने अपनी कहानी का वर्णन करते हुए कहा “मैं केवल 20 साल का था जब मुझे पता लगा कि मैं एचआईवी से पीड़ित हूं। मेरे साथ-साथ मेरी बीवी भी इस बीमारी का शिकार हो गई थी। हमारे लिए यह जीवन का सबसे कठिन पड़ाव था। मेरे माता-पिता को समाज का डर खाए जा रहा था और इसी कारण उन्होंने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की। माले ने कहा” असफल आत्महत्या के प्रयासों के बाद वे मुझे छोड़कर बेलगाम(कर्नाटक) चले गए।

हार न मानने वाले माले ने कहा” मैंने अपने ही तरह परिवार द्वारा त्याग दिए गए एचआईवी रोगियों के लिए कुछ करने की ठानी। मैंंने एचआईवी पीड़ितों की मदद के लिए पहल की। माले ने बताया” स्पंदना नेटवर्क ऑफ पॉजिटिव पीपल 42 साल पुरानी संगठन है जो एचआईवी पॉजिटिव बच्चों के लिए हॉस्टल चलाती है। बच्चों को भाेजन,आश्रय और कपड़े जैसी जरुरी चीजें देती है।

ट्रांसजेंडरों के लिए घर का निर्माण कर रही हूं : नुरी सलीम

सेक्स वर्कर की नौकरी करने के दौरान मुझे पता चला कि मुझे एचआईवी है। इसके बाद मैने यह काम छोड़ दिया। एचआईवी ने ही मुझे दूसरे ऐसे पीड़ितों की सहायता करने की राह दिखाई। मैं एचआईवी पीड़ित ट्रांसजेंडरों के लिए घर का निर्माण कर रही हूं। यह कहना था 24 वर्षीय नुरी सलीम का जिन्हें भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर 1987 में तीसरी एचआईवी मरीज घोषित कर दिया था। नुरी ने आगे बताया” मैं एक ट्रांसजेंडर हूं जिस कारण मैने बचपन से ही काफी परेशानियों का सामना किया है। 13 साल की उम्र में मैंने अपना घर छोड़ा जिसके बाद मैने साउथ इंडियन पॉजिटिव नेटवर्क(एसआईपी) शुरु करने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि इस अभियान के तहत एचआईवी पॉजिटिव लोगों को सलाह, जरुरी जानकारी और अन्य प्रकार की सेवाएं दी जाती है।

नुरी ने कहा” साउथ इंडियन पॉजिटिव नेटवर्क में हम लगभग 45 बच्चों को आश्रय,भोजन,शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्‍थ्य की भी देखभाल करते हैं। एसआईपी के बाहर भी मैं 103 बच्चों का ख्याल रखती हूं। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि आज मेरे बच्चे अच्छी जगह नौकरी कर रहे हैं। सरकार ने मेरे इस कदम में मेरा साथ दिया और मेरे नए घर के निर्माण के लिए कुछ कंपनियों ने भी दान करने की बात भी कही है।

मेरी स्थिति ने लोगों को एंटी-रेट्रोवायरल उपचार के लिए किया प्रेरित :चानुमोलू

चानुमोलू बताती है “मुझे मेरी शादी से पहले नहीं बताया गया था कि मेरे पति को एड्स है। शादी के केवल पांच साल बाद ही मेरे पति की मौत हो गई और फिर डॉक्टर्स ने बताया कि मुझे एचआईवी है। मुझे और मेरी बेटी को देखने वाला कोई नहीं था। शुरुआत के कुछ दिनों में मैने महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के लिए काम किया। कुछ समय बाद मैं एचआईवी-टीवी रिडक्‍शन प्रोग्राम में एक आउटरीच कार्यकर्ता बन गयी।

चानुमोलू बताती है” मेरी एचआईवी की स्थिति का खुलासा करने के बाद बहुत सारे लोगों ने एंटी-रेट्रोवायरल उपचार और पति-पत्नी की परीक्षण के महत्व को समझा। मैं अपनी कहानी खुलकर लोगों को बताती हूं जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को स्पॉसल (पति-पत्नी) को परीक्षण के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

इन लोगों की कहानी उदाहरण है कि अगर लोग खुलकर एड्स और एचआईवी के बारे में बात करेंगे तो देश की स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। यह समझना बेहद जरुरी है कि एड्स हऊआ नहीं है। बिना झिझके बात करना आवश्यक है जिससे एचआईवी से पीड़ित लोग गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।

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