सुरक्षित प्रसव के लिए मान्यता आई आगे, पढ़ें

नई दिल्ली : 90 प्रतिशत से अधिक गर्भवती महिलाएं अपनी पोषण संबंधी जरूरतों को लेकर अनजान हैं, कई राज्यों में आर्थिक सर्वे 2015-16 में यह बात सामने आई है। हाल के वर्षों में सार्वजनिक अस्पतालों में संस्थागत प्रसव पर ध्यान केंद्रित कर मातृत्व मृत्यु दर को कम किया है, लेकिन कई प्रसूति रोग विशेषज्ञों को लगता है कि छोटे निजी अस्पनतालों को निश्चित रूप से गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान करने के लिए सशक्त होना चाहिए। ताकि इस मुद्दे को पूरी तरह से हल किया जा सके।

निजी क्षेत्र के अस्पतालों को सार्वजनिक अस्पतालों की ही तरह मानकों और सुविधाओं को स्थापित करने के लिए काफी काम करने की जरूरत है। सबूत-आधारित मानक प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने से माताओं एवं नवजात शिशुओं की जिंदगी को जोखिम हो सकता है। बहुत से राज्यों में अभी भी तकरीबन 30 प्रतिशत संस्थागत डिलीवरीज निजी अस्पतालों में होती हैं, इसे देखते हुए अब फोकस निजी मातृत्व देखभाल में मुहैया कराई जाने वाली गुणवत्ता की ओर करना चाहिए। इस जरूरत को महसूस करते हुए फेडरेशन ऑफ ऑब्सगेट्रिक एंड गायनैकोलॉजिकल सोसायटीज ऑफ इंडिया ने एक पहल शुरू की है, जिसका नाम है ‘मान्यता’। इसका उद्देश्य बच्चे के जन्म के दौरान एवं उसके फौरन बाद माताओं को पूरे सम्मान के साथ एवं सुरक्षित देखभाल मुहैया कराना है। यह पहल विश्व् स्वास्य संगठन और प्रसव से पूर्व (एंटीनेटल), प्रसव के दौरान (इंट्रापार्टम) और प्रसव के बाद (पोस्टेपार्टम) देखभाल के लिए राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप गुणवत्ताक मानकों को लागू करने पर आधारित है।

इस पहल के अंतर्गत अस्पताल या नर्सिंग होम के डॉक्टरर एवं नर्स 16 क्लीनिकल एवं 10 फैसिलिटी मानदंडों पर प्रशिक्षण लेते हैं। एक बार प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उनका योग्य पर्यवेक्षक द्वारा मानकों का पालन करने पर मूल्यांकन किया जाता है। यदि वे मूल्यांकन में उत्तीर्ण हो जाते हैं, तब अस्पाताल को मान्यता प्रमाण मिलता है और इसे दो वर्षों के लिए मातृत्वद देखभाल में अपनी उत्कृष्टता के लिए पहचान मिलती है। झारखंड के 13 जिलों – रांची, धनबाद, बोकारो,गढ़वा, लोहरडगा, गिरीडीह, रामगढ़, हजारीबाग, खूंटी, देवघर, पलामु, कोडरमा एवं जमशेदपुर में 110 से अधिक अस्पातालों को अभी तक प्रमाणन मिल चुके हैं। इनमें से कुछ जिले महत्वाकांक्षी जिले हैं।  अपनी शुरुआत से ही, झारखंड में मान्यता प्रमाणित अस्पतालों द्वारा 80 हजार से अधिक डिलीवरीज की जा चुकी हैं। डॉ. निवेदिता दत्ता, पहल को प्रचारित करने वाली डॉक्टर ने कहा कि मान्यता नर्सों का कौशल बढ़ाने और उन्हें प्रशिक्षण देने में महत्वपूर्ण है। इससे वे पोस्ट्पार्टम हैमरेज (पीपीएच) और प्रि-इकलैम्प्सिया जैसी जटिलताओं एवं इमरजेंसी को संभाल सकती हैं। यह जटिलतायें भारत में मातृत्व संबंधी मौतों का सबसे प्रमुख कारण हैं।

उन्होंने बताया कि मरीजों को गुणवतापूर्ण देखभाल मुहैया कराने, खराब प्रणाली के कारण होने वाले जोखिमों को दूर करने और स्वास्थ सेवा प्रदाताओं को मरीज का मूल्यांकन करने तथा उसके उपचार की योजना बनाने के लिए स्पष्ट एवं सटीक मेडिकल रिकॉर्ड एकत्र करना महत्वपू र्ण है। इसने मेडिकल रिकॉर्ड्स को मानकीकृत करने की भूमिका पहचाना है और डॉक्यूमेंटेशन को उनके प्रशिक्षण का अभिन्न हिस्सा बनाया है। इसका एक सबसे बड़ा लाभ है कि यह आपके अस्पताल को चिकित्सा एवं कानून संबंधी मुद्दों से सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है। प्रमाणित अस्पताल के मालिकों को भी लगता है कि इस पहल से कई नर्सों को भी लाभ पहुंचा है और वे अपने सॉफ्ट-स्किल को विकसित करने में भी सक्षम हुई हैं। नर्सें मरीजों से किस तरह बात करती हैं, इसमें भी एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। बोकारो के मान्यता-प्रमाणित अस्पसताल की एक मरीज अल्का देवी ने कहा कि मैं अंतिम क्षण में अस्पताल में आई थी, फिर भी नर्स मुझे पूरी प्रक्रिया समझाने और डॉक्टर से बात करने में सक्षम थी कि मेरे लिए क्या सबसे अच्छा होगा। उन्होंने मेरी बहुत अच्छे से देखभाल की।

प्रोग्राम का नेतृत्व कर रही डॉ. रागिनी सिंह ने कहा कि मान्यता प्रशिक्षण से नर्सों की जानकारी को बढ़ाया है, वे आगे रहकर मरीजों से बात करती हैं,मरीज की ब्रीफिंग के दौरान सभी महत्वापूर्ण जानकारियों को दर्ज करना सुनिश्चित करती हैं, संभावित डायग्नोसिस के लिए मुझसे बात कर अधिक जानने में रुचि दिखाती हैं, वे हर तरह की इमरजेंसी को लेकर सचेत हैं और तैयार भी हैं। इससे मेरा उन पर भरोसा और आत्म विश्वातस बन गया है। मान्यता का उदेश्य हर जिले में अधिक से अधिक निजी अस्पतालों को इसके अंतर्गत लाना और महिलाओं के लिए प्रसव को सुरक्षित बनाना है।

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