सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस ने कृषि संकट,बेरोजगारी सहित कई मुद्दे उठाए

नयी दिल्ली : संसद में सोमवार को बजट सत्र शुरू हो रहा है, इससे ठीक एक दिन पहले सरकार ने रविवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई। इस बैठक में कांग्रेस ने कृषि संकट, बेरोजगारी, सूखा सहित प्रेस की स्वतंत्रता के मुद्दे उठाए साथ ही जम्मू कश्मीर में जल्द विधानसभा चुनाव कराने की भी मांग की। वहीं विपक्षी पार्टियों ने भी कहा है कि इन विषयों पर सरकार संसद में चर्चा कराए।
बैठक में प्रधानमंत्री सहित सभी दलों के नेता मौजूद रहे
सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी, के. सुरेश, नेशनल कान्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के डेरेक ओब्रायन भी उपस्थित रहे।
विपक्ष ने उठाया महिला आरक्षण विधेयक का मुद्दा
बैठक के दौरान विपक्ष की ओर से पुरजोर तरीके से महिला आरक्षण विधेयक का मुद्दा उठाया गया। टीएमसी नेता सुदीप बंदोपाध्याय और ओब्रायन ने विधेयक को संसद के इसी सत्र में सूचीबद्ध किए जाने और पारित कराए जाने पर जोर दिया। वहीं विपक्ष ने संघवाद के कमजोर होने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि उन्हें राज्यों पर जानबूझकर निशाना साधा जाना स्वीकार नहीं है।
अध्यादेश का इस्तेमाल आपात स्थिति में किया जाना चाहिए
टीएमसी ने चुनाव में सरकारी खर्च और बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने सहित चुनाव सुधार के मुद्दों को उठाया। सरकार द्वारा अध्यादेशों को लागू किये जाने पर चिंता जाहिर करते हुए पार्टी ने कहा कि अध्यादेश का इस्तेमाल आपात स्थिति में ही किया जाना चाहिए। बंदोपाध्याय और ओब्रायन ने कहा कि “दुर्भाग्य से सोलहवीं लोकसभा में इसका अत्यधिक इस्तेमाल किया गया। 70 साल में सबसे ज्यादा अध्यादेश।”
कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष ताकतों की बुनियाद
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत की। आजाद ने कहा कि “हमने सरकार को बधाई दी। लेकिन इसके साथ हमने उन्हें यह भी बताया कि यह विचारधाराओं की लड़ाई है, यह विचारधाराओं की लड़ाई थी और विचारधाराओं की लड़ाई रहेगी।” साथ ही उनका कहना था कि “कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष ताकतों की बुनियाद है और हमेशा इस भावना को जीवित रखे रहने के लिए काम करते रहेगी, चाहे सरकार में हो या विपक्ष में।”
पत्रकारों की आवाज दबाने का आरोप लगाया
उन्होंने कहा कि “सत्ता से बाहर रहते हुए भी हम किसानों, मजदूरों और महिलाओं के उत्थान के लिए काम करते रहेंगे।” उन्होंने कहा कि किसानों के मुद्दे, सूखा, पेयजल की कमी और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए। साथ उन्होंने यह भी कहा कि
“हमने प्रेस की आजादी, पत्रकारों के प्रति सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं के व्यवहार के मुद्दे को भी उठाया।” उन्होंने सरकार पर पत्रकारों की पिटाई करवाने और उनकी आवाज दबाने की कोशिश किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि “हमने इसकी निंदा की और सरकार से इस पर ध्यान देने का अनुरोध किया।”
राष्ट्रपति शासन की कोई जरूरत नहीं
जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर आजाद ने कहा कि वहां राष्ट्रपति शासन की कोई जरूरत नहीं है।
उनका कहना था कि एक तरफ सरकार कहती है कि चुनाव के लिए माहौल सही नहीं है और दूसरी तरफ केंद्र कहता है कि पिछले साल पंचायत चुनाव शांति से कराये गये। हाल ही में लोकसभा चुनाव भी कराये गये जो राज्य में शांतिपूर्ण तरीके से हुए। आजाद ने यह भी कहा कि “हमने सरकार से कहा कि आप चुनाव इसलिए नहीं करा रहे क्योंकि भाजपा सरकार नहीं बनेगी। इसलिए आप राज्यपाल के शासन के माध्यम से राज्य को चलाना चाहते हैं।”

बता दें कि पिछले सप्ताह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जम्मू कश्मीर में 3 जुलाई को समाप्त हो रहे राष्ट्रपति शासन की अवधि को और छह महीने बढ़ाने को मंजूरी दी थी।

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