अल्सर-कारण, लक्षण व बचाव

गृहणी अर्थात् ड्योडिनम या आमाशय में घाव हो जाने का मतलब पेट में अल्सर हो जाना है। यह घाव आमाशय के पहले व गृहणी के बाद के अंगों ओसोफैगस व छोटी आंत में भी हो सकता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भोजन की पाचन क्रिया हेतु आमाशय में पैराइटल कोशिकाओं में से हाईड्रोक्लोरिक अम्ल व जठर ग्रंथियों में से जठर रस का स्राव होता है।

यदि यह स्राव अधिक मात्रा में होने लगे तो इन दोनों अम्लों तथा आमाशय, ग्रहणी व अन्य अंगों की रक्षक श्लेष्मा परत में संतुलन बिगड़ जाता है। फलत: अधिक मात्रा में मौजूद अम्ल श्लेष्मा का भी पाचन करने लगते हैं। इस कारण जिन अंगों की श्लेष्मा नष्ट हो जाती है, उन अंगों में घाव बन जाता है। हालांकि अल्सर के अधिकतर रोगी वयस्क ही होते हैं, तो भी कुछ प्रतिशत किशोर भी इससे प्रभावित हो जाते हैं किंतु पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह रोग कम होता है।

इस बीमारी से रोगी के पेट के ऊपरी हिस्से अर्थात दोनों पसलियों के बीच में दर्द होता है। अल्सर अगर आमाशय में है तो रोगी का पेट भोजन करने के तुरंत बाद दर्द करने लगता है। उसे उल्टियां भी होने लगती हैं। यदि अल्सर ग्रहणी में है तो रोगी का पेट भोजन करने के चार-पांच घंटे बाद दर्द करता है। इसके विपरीत अगर अल्सर ड्योडिनम में है तो रोगी भोजन के बाद आराम महसूस करता है। इस अल्सर के मरीज अधिकतर रात में दर्द होने की शिकायत करते हैं।

इनके अलावा पेट के ऊपरी हिस्से पर दबाव डालने से दर्द, पेट में तीव्र दर्द, रोगी में एनीमिया के लक्षणों का प्रकट होना, मल का रंग काला होना, पेट के ऊपरी भाग में गोला घूमता सा महसूस होना, खट्टी डकारें आना, सीने में जलन तथा पेट फूलना भी अल्सर के लक्षण हैं। इस रोग के पेट दर्द में अम्ल नाशक औषधि एंटासिड लेने से अथवा उल्टी हो जाने से रोगी को आराम मिलता है।

अल्सर है भी या नहीं, इसका पता जांच के बाद ही चलता है, अत: उक्त लक्षणों वाले व्यक्ति को शीघ्रता से किसी विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। इसके लिए ‘ओसोफेगो गैस्ट्रो इयोडिनोस्कोपी’ बेहतर रहती है। इस जांच की सुविधा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सर्वोत्तम देन है। इसमें प्रकाश के सिद्धान्तों पर आधारित एक विशेष प्रकार की नली द्वारा पेट के विभिन्न अंगों का परीक्षण किया जाता है। यदि अल्सर की परिस्थिति संदेहास्पद लगती है तो उसकी ऊतकीय विकृति की जांच और बायोप्सी भी इसी नली की सहायता से की जा सकती है। जांच के बाद उचित उपचार आवश्यक होता है नहीं तो अल्सर खतरनाक जटिलताओं जैसे-अत्यधिक रक्तचाप, एनीमिया, आमाशय या ड्योडिनम के रास्ते में छिद्र हो जाना, आमाशय के निकास द्वार का फाईब्रोसिस के कारण संकुचित या अवरुद्ध हो जाना, कैन्सर बन जाना में परिवर्तित हो सकता है।

वैसे हम नीचे लिखी बातें अमल में लाकर पेट में हाईड्रोक्लोरिक अम्ल के अधिक स्राव के कारण होने वाले श्लेष्मा के क्षय को रोककर अल्सर हो जाने की संभावना से पूरी तरह बच सकते हैं।
– अल्सर वंशानुगत हस्तांतरित भी होता है, अत: जिन लोगों के माता-पिता इसके मरीज हों, उन्हें पूर्व से ही सचेत रहना चाहिए।
– अत्यधिक चिंता तथा मानसिक तनाव से बचना चाहिए क्योंकि चिंतित तथा तनावग्रस्त व्यक्ति की पेराइटल कोशिकायें अधिक मात्रा में हाईड्रोक्लोरिक अम्ल छोड़ने लगती हैं।
– दर्दनाशक दवायें बहुत समय तक न लें, न ही बिना चिकित्सकीय परामर्श के लें क्योंकि इनसे पेट में अधिक अम्ल तो उत्पन्न होने ही लगता है। इनसे श्लेष्मा की अम्ल प्रतिरोधी क्षमता भी नष्ट होती है।
– हारमोन्स की विभिन्न विसंगतियों के अलावा एनीमिया आदि के लक्षण प्रकट होते ही उचित इलाज करवाना चाहिए, क्योंकि यह भी पेट में अधिक अम्ल उत्पन्न करती है।
– अधिक गर्म भोजन नहीं करना चाहिए, न ही अधिक गर्म, चाय, काफी पीनी चाहिए क्योंकि इससे श्लेष्मा की अम्ल प्रतिरोधी क्षमता नष्ट होती है। बार-बार चाय, काफी पीना तथा खाली पेट चाय, काफी पीना भी श्लेष्मा की अम्ल प्रतिरोधी क्षमता नष्ट करती है।
– अधिक मसालेदार सब्जियां तथा शराब पेट में अधिक अम्ल उत्पन्न करती है तथा श्लेष्मा की अम्ल प्रतिरोधी क्षमता को नष्ट करती हैं। धूम्रपान तथा तम्बाकू में भी यही दुर्गुण है।
– खाली पेट कदापि न रहें। अगर बहुत ही आवश्यक हो तो सप्ताह में एक दिन सात-आठ घंटे ही खाली पेट रहना चाहिए। ज्यादा खाली पेट रहने से स्रावित अम्ल श्लेष्मा का ही पाचन करने लगते हैं।

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