भारतीय संविधान को बनाने में इन 15 महिलाओं ने दिया था अहम योगदान

कोलकाता : इस साल देश 26 जनवरी को 72 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ था। जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बनाया था। संविधान के निर्माण में करीब 284 लोग शामिल थे। जिसमें 15 महिलाएं भी थीं। ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने देश के संविधान में अहम योगदान दिया। आईए यहां जानें इन 15 महिलाएं के बारे में…
अम्मू स्वामीनाथन
अम्मू स्वामीनाथन एक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वंत्रता संग्राम सेनानी और राजनीतिज्ञ थीं। जिनका जन्म 1894 में केरल के पल्लकड़ जिले में हुआ था। संविधान सभा में ये मद्रास की प्रतिनिधि थीं। जब 24 नवंबर 1949 में भीमराव आंबेडकर संविधान के बारे में अपनी बात रख रहे थे। तब आत्मविश्वास से अम्मू ने कहा कि भारत के बारे में दुनिया वालों का कहना है कि भारत में महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया है। लेकिन अब हम कह सकते हैं कि भारतीयों ने अपना संविधान खुद बनाया है और दूसरे देशों की तरह अपने देश में भी महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिया है।
बेगम एजाज रसूल
बेगम एजाज रसूल एक राजसी परिवार में पैदा हुआ थी और उन्होंने जमींदार नवाब ऐजाज रसूल से शादी की थी। वे संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। साल 1950 में, भारत में मुस्लिम लीग भंग होने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गईं। साल 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गई।
दक्श्यानी वेलायुद्धन
दक्श्यानी वेलायुद्धन का जन्म 1912 में कोचिन में हुआ। वे संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला सदस्य थीं। जो 1946 से 1952 तक प्रोविजनल पार्लियामेंट की मेंबर रहीं।
दुर्गाबाई देशमुख
दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई, 1909 में राजमुंदरी में हुआ था, बारह वर्ष की उम्र में उन्होंने गैर-सहभागिता आंदोलन में भाग लिया और आंध्र केसरी टी प्रकाशन के साथ उन्होंने मई 1930 में मद्रास शहर में नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। वर्ष 1936 में उन्होंने आंध्र महिला सभा की स्थापना की, जो एक दशक के अंदर मद्रास शहर में शिक्षा और सामाजिक कल्याण का एक महान संस्थान बन गया।
हंसा जिवराज मेहता
3 जुलाई, 1897 को, बड़ौदा के मनुभाई नंदशंकर मेहता के घर जन्मी हंसा मेहता ने इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ शिक्षिका और लेखिका भी थीं। उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं और गुलिवर्स ट्रेवल्स सहित कई अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद भी किया। वे 1926 में बॉम्बे स्कूल्स कमेटी के लिए चुनी गईं और 1945-46 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं।
कमला चौधरी
कमला चौधरी का जन्म लखनऊ के एक संपन्न परिवार में हुआ था, बावजूद इसके उन्हें अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ा था। शाही सरकार के लिए अपने परिवार की निष्ठा से दूर जाने से वे राष्ट्रवादियों में शामिल हो गई और साल 1930 में गांधी द्वारा शुरू की गई नागरिक अवज्ञा आंदोलन में भी उन्होंने सक्रियता से हिस्सा लिया। पचासवें सत्र में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष थी और सत्तर के उत्तरार्ध में लोकसभा के सदस्य के रूप में चुनी गई थी।
लीला रॉय
लीला रॉय का जन्म अक्टूबर 1900 में असम के गोलपाड़ा में हुआ था। 1921 में बेथ्यून कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और अखिल बंगाल महिला पीड़ित समिति की सहायक सचिव बनीं और अपने अधिकारों की मांग के लिए मीटिंग की व्यवस्था की। 1923 में, अपने दोस्तों के साथ, उन्होंने दीपाली संघ की स्थापना की और उन स्कूलों की स्थापना की, जो राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गए, जिनमें प्रसिद्ध नेताओं ने भाग लिया। बाद में, 1926 में, डेकरा और कोलकाता में महिला छात्रों के संघ, छत्री संघ की स्थापना की गई।
मालती चौधरी
मालती चौधरी का जन्म 1904 में पूर्वी बंगाल, जो अब बांग्लादेश है, में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। 1921 में, 16 साल की उम्र में, मालती चौधरी को शांतिनिकेतन भेजा गया। जहां उन्होंने ने विश्व भारती में दाखिला लिया। नमक सत्याग्रह के दौरान, मालाती चौधरी और उनके पति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए और आंदोलन में भाग लिया।
पूर्णिमा बनर्जी
पूर्णिमा बनर्जी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समिति की सचिव थीं। वे उत्तर प्रदेश की महिलाओं के एक कट्टरपंथी नेटवर्क में से थी जो साल 1930 के दशक के अंत में स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे आगे थीं। उन्हें सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किया गया था। शहर समिति के सचिव के रूप में वह ट्रेड यूनियनों, किसान मीटिंग्स और अधिक ग्रामीण जुड़ाव की दिशा में काम करने और संगठित करती थीं।
राजकुमारी अमृत कौर
अमृत ​​कौर का जन्म 2 फरवरी, 1889 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं और उन्होंने इस पद को दस साल तक संभाला था। उन्होंने इंग्लैंड के डोरसेट में शेरबोर्न स्कूल फॉर गर्ल्स में शिक्षा प्राप्त की। वे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स की संस्थापक थीं।
रेणुका रे
रेनुका एक आईसीएस अधिकारी सतीश चंद्र मुखर्जी की बेटी थीं. उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए की पढ़ाई पूरी की।  साल 1934 में, एआईडब्ल्यूसी के कानूनी सचिव के रूप में उन्होंने ‘भारत में महिलाओं की कानूनी विकलांगता’ नामक एक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया। साल 1943 से साल 1946 तक वह केन्द्रीय विधानसभा, संविधान सभा और अनंतिम संसद की सदस्य थी। साल 1957 में और फिर 1962 में वह लोकसभा में मालदा की सदस्य थी।  उन्होंने अखिल बंगाल महिला संघ और महिला समन्वयक परिषद की स्थापना की।
सरोजिनी नायडू
सरोजिनी नायडू, जिन्हें भारत का कोकिला भी कहा जाता है , का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में हुआ था। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं और भारतीय राज्य राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने वाली पहली महिला थीं।
सुचेता कृपलानी
सुचेता कृपलानी का जन्म 1908 में वर्तमान हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ था। उन्हें विशेषरूप से साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है।
विजया लक्ष्मी पंडित
विजया लक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त, 1900 को इलाहाबाद में हुआ था. वे भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। साल 1932 से 1933, साल 1940 और साल 1942 से 1943 तक अंग्रेजों ने उन्हें तीन अलग-अलग जेल में कैद किया था।  राजनीति में विजया का सफर आधिकारिक तौर पर इलाहाबाद नगर निगम के चुनाव के साथ शुरू हुआ।
एनी मस्कारीन
एनी मस्कारीन का जन्म केरल के तिरुवनंतपुरम के एक लैटिन कैथोलिक परिवार में हुआ था। वे त्रावणकोर राज्य कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल होने वाली पहली महिला थीं।

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