कोरोना की दूसरी घातक लहर : बहुत कुछ अपने साथ ले गयी तो बहुत कुछ सिखा भी गयी

सर्जना शर्मा
कोरोना की दूसरी लहर ने चारों तरफ हाहाकार मचा दिया। एक समय ऐसा आया कि अस्पतालों में बेड नहीं, ऑक्सीजन नहीं, दवाएं नहीं, हर रोज़ सैकड़ों मौत श्मशान घाटों में अंतिम संस्कारों के लिए लंबी लाइनें। हर जगह काला बाज़ारी, लूट का धंधा, 50 रुपए की चीज़ 5000 रुपए में, सात हज़ार का इंजेक्शन सत्तर हज़ार में। परिवार के परिवार कोरोना की चपेट में। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने हाथ खड़े कर दिए। केंद्र सरकार के पास भी संसाधन कम पड़ गए। ऐसे आपदा काल में समाज के कुछ लोगों का स्वार्थी चेहरा सामने आया तो दूसरी तरफ समाज का एक मानवीय परोपकारी और संवेदनशील चेहरा सामने आया। तुरत फुरत में अनेक सामाजिक संगठन सक्रिय हो गए तो अपने स्तर पर कुछ लोगों ने छोटे छोटे सहायता समूह बना लिए और देवदूत बन कर खड़े हो गए। कोरोना का भय, मौत का आतंक, अपनों को खोने का गम, अपने काम धंधे गंवा चुके लोग इन सबका हाथ थामा समाज के देवदूतों ने।
वी द वूमेन ऑफ इंडिया वैसे प्रोफेशन महिलाओं का एक निजी समूह है जो महिलाओं के अधिकारों और अन्य विषयों पर केंद्रित रहता था लेकिन जैसे ही कोरोना का संकट दिल्ली एनसीआर में बढ़ा ये कोरोना हेल्प ग्रुप में तबदील हो गया। ग्रुप की संस्थापक सुप्रीम कोर्ट की वकील शोभा गुप्ता ने अलग अलग टीमें गठित कर दी। इस ग्रुप में केवल महिलाएं नहीं हैं, पुरुष भी हैं। अस्पताल में बेड दिलाने के लिए, ऑक्सीजन, ब्लड, प्लाज़मा, एंबुलेंस, दवाएं इंजेक्शन और देखते ही देखते ही एक पूरा सिस्टम बन गया। मरीजों के रिश्तेदारों दोस्तों की ओर से ग्रुप में आ रहे आकुल व्याकुल घबराए हुए अनुरोधों पर जी जान से जुट जाना और हर संभव कोशिश करके मदद करना। ग्रुप के लोग रात रात भर जागते कौन सी दवा कहां उपलब्ध है, कैसे मिल सकती है, किस अस्पताल में कहां बेड खाली है, ये सारी जानकारियां देते रहते हैं। ये सच है कि छोटे समूहों के पास सरकारों की तरह संसाधन सुविधाएं और स्टाफ नहीं होता लेकिन एक छोटा सा प्रयास भी बहुत सारे लोगों को राहत दे देता है। उस संकट काल में सही सूचना और सही जानकारी की ही सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। एक नेटवर्क बना कर काम करना बहुत सफल प्रयोग रहा।
दिल्ली एनसीआर और देश के अन्य हिस्सों में सबसे सराहनीय भूमिका रही सेवा भारती की। बेकाबू हालात को संभालने के लिए इंतजाम करने में थोड़ा समय जरूर लगा, लेकिन जो प्रबंध किए गए वो बेहतरीन थे। हल्के लक्षण वाले मरीजों के लिए आइसोलेशन सेंटर, ऑक्सीजन बेड वाले अस्थाई अस्पताल, कोविड ग्रस्त परिवारों के घरों में तीन समय खाना भिजवाना, ज़रूरतमंद परिवारों को राशन किट, मास्क सेनिटाइज़र बांटना। सेवा भारती ने एक सेंट्रल कोविड रिस्पांस टीम बनायी तो जिला वार भी टीमें बनायीं, हर टीम का एक लीडर बनाया ताकि ज़रूरत के अनुसार तुरंत काम हो सके। और कोरोना से जूझ रहे परिवारों को बड़ी राहत मिली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हमेशा की तरह अपने स्वयं सेवकों को समाज के लिए काम पर लगा दिया। संघ के सभी स्कूलों को अस्पतालों में बदल दिया गया। सेवा भारती के डॉक्टरों की टीम टेली परामर्श के साथ साथ अस्थायी अस्पतालों में भी मरीजों की देख भाल में जुट गयी। घरों में आईसीयू बनवाना। आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों की मदद करना। श्मशान घाटों में संघ के स्वयं सेवक दिन रात खड़े रहे। जब अपने खून के रिश्तों ने अपनों की लाश लेने और हाथ लगाने से इंकार कर दिया घर का दरवाज़ा तक नहीं खोला तब इन स्वयं सेवकों ने मानवता का फर्ज निभाया। चारों और जलती चिताओं के बीच पूरे दिन खड़े रहना आसान नहीं है। कुछ स्वयं सेवकों ने तो बड़ी हृदय विदारक घटनाएं सुनायीं, आठ-आठ साल के बच्चे अपने मां बाप के शव लेकर अकेले श्मशान घाट आए। उन बच्चों को कुछ पता नहीं था कैसे अंतिम संस्कार किया जाता है। जब अपनों ने साथ छोड़ दिया तो इन्होंने जिम्मेदारी उठा ली।
सिख समाज और गुरुद्वारों की भूमिका बहुत सराहनीय है। घरों में लंगर भेजने से लेकर ऑक्सीजन लंगर लगाना, ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर मरीजों के घर भेजना। ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर सेंटर खोलना। दिल्ली एनसीआर के अनेक गुरुद्वारे अस्पतालों में तब्दील हो गए। तमाम आधुनिक मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करायीं और यदि आपने गुरुद्वारे में किसी ने मदद के लिए फोन कर दिया, उनके पलट कर चार फोन आयेंगे वे सुनिश्चित करेंगे कि आपको जो चाहिए था वो मिला या नहीं। दिल्ली के झंडेवाला एक्सटेंशन के उद्योगपति और समाजसेवी अशोक सचदेवा ने गुरु रामराय स्कूल में 33 बिस्तर का कोविड अस्पताल बनवाया, जिसमें डॉक्टर नर्स हैं ऑक्सीजन सिलिंडर ऑक्सीजन कंसंट्रेटर हैं। साथ ही इसमें देसी और आयुर्वेदिक सुविधाएं भी दी जाती हैं। हर मरीज को अजवायन, कपूर और लौंग की पोटली और देसी घी दिया जा रहा है ताकि एलोपैथ के साथ साथ आयुर्वेद उपचार भी होता रहे। अशोक सचदेव कहते हैं कि उनको सेवा भारती का सहयोग भी मिल रहा है। मरीजों को बहुत पौष्टिक भोदन दिया जा रहा है।
कांग्रेस की युवा शाखा एनएसयूआई ने मरीजों को लाने ले जाने के लिए मुफ्त ऑक्सीजन एंबुलेंस सेवा चलायी। राजनीतिक दल बड़े संगठनों के पास तो पैसा और सुविधा होते हैं लेकिन समाज का वो व्यक्ति जो रोज खाता और कमाता है वो भी पीछे नहीं रहा दिल्ली के कुछ ऑटोरिक्शा चालकों ने अपने ऑटो को ऑक्सीजन एंबुलेंस बना दिया। ऑक्सीजन के सिलिंडर के साथ मरीजों को मुफ्त में अस्पातल पहुंचाना। देखा जाए तो समाज की ये ताकत ही किसी भी देश को बड़े से बड़े संकट से निकाल सकती है। इस्कॉन ने भी फ्री भोजन का व्यवस्था की। अनेक मंदिरों ने लंगर लगाए।
कोरोना जैसा संकट देश तो क्या दुनिय़ा ने भी पहले कभी किसी ने नहीं देखा था। कोरोना की पहली लहर भारत के लिए इतनी विकट नहीं थी लेकिन आर्थिक असर बहुत ज्यादा पड़ा था। निम्न वर्ग को हर तरह की सहायता समाज और सरकार ने दी। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा पिसा मध्यम वर्ग, जो न किसी के सामने अपने हालात बता सकता है और न ही किसी से मांग सकता है। यहां तक कि वकील, डॉक्टर, मझोले दुकानदार, ब्यूटी पॉर्लर, काम के स्थानों पर छंटनी आदि ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के अनेक वकीलों को आर्थिक तंगी का समान करना पड़ रहा है। पिछले साल से सुप्रीम कोर्ट में वर्चुअल सुनवाई चल रही है। पहली लहर तो पैसे तक ही सीमित थी दूसरी लहर तो जान लेवा हो गयी है। अनेक वकीलों की मौत हो गयी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने बहुत सराहनीय कदम उठाया । कोराना पीड़ित परिवारों को आर्थिक मदद दी। एससीबीए के अध्यक्ष विकास सिंह ने कोराेना में जान गंवा चुके वकीलों के परिवारों, कोरोना ग्रसित हो कर ठीक हो चुके वकीलों के लिए आर्थिक मदद का प्रावधान किया। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के वकीलों उनके परिवार और स्टॉफ के लिए वैक्सीनेशन का प्रबंध भी किया। आजकल हर रोज दौ सौ लोगों का वैक्सीनेशन किया जा रहा है । इसी तरह दिल्ली हाई कोर्ट और तीस हज़ारी कोर्ट में भी वकीलों की निजी स्तर पर मदद की जा रही है । इस संकट से उभरने में अभी कितना समय लगेगा कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो सबसे बड़ी चुनौती जान बचाने की है । इस भयंकर संक्रमण से बचा कैसा जाए।
मेडिकल जगत में सभी डॉक्टर लालची और स्वार्थी हैं ऐसा भी नहीं है। यू ट्यूब फेसबुक पर लाइव आ कर कुछ डॉक्टर हजारों लाखों लोगों को कोराेना से बचने और सही इलाज़ की जानकारी दे रहे हैं। अपनी जान की परवाह किए बिना। पिछले एक साल से दिन में दो दो तीन तीन बार यू ट्यूब फेसबुक पर लाइव आ कर दिल्ली के पद्मश्री डॉ. के. के. अग्रवाल ने लाखों करोड़ों लोगों को कोराेना के हर पहलू के बारे में जागरूक किया। समाज सेवा और परोपकार के लिए प्रसिद्ध और सब लोगों में लोकप्रिय डॉ. अग्रवाल ने अपनी जान की परवाह न करके समाज सेवा जारी रखी। यहां तक कि स्वयं कोविड संक्रमित होने पर भी पांचवें दिन तक ऑक्सीजन की नली लगा कर भी लाइव करते रहे अस्पताल में तब दाखिल हुए जब उनको लगा कि अब कोई रास्ता नहीं बचा और लोगों की जान बचाने वाला ये कर्मयोगी डॉक्टर अपनी जान नहीं बचा पाया। मरते दम तक कोरोना से बचने पर लाइव जानकारी देता रहा। उनके आखिरी लाइव के अंतिम शब्द थे शो मस्ट गो ऑन। समाज के लिए अंतिम सांस तक जीना ऐसे ही लोग समाज का मनोबल बढ़ाते हैं और समाज को आपदाओं से लड़ने की शक्ति देते हैं।
निजी अस्पतालों की भूमिका आपदा काल में बहुत अच्छी नहीं रही। वैसे भी निजी अस्पतालों में वही लोग जा सकते हैं जिनके पास बहुत पैसा है। जब दिल्ली एनसीआर में कोरोना चरम पर था तो कुछ निजी अस्पतालों में बेड की भी ब्लैक हो रही थी। अस्पतालों के दलाल पचास हज़ार से एक लाख रूपया तक लेकर गंभीर रूप से बीमार मरीजों को बेड उपलब्ध करा रहे थे। लेकिन यहां भी कुछ निजी अस्पतालों ने मानवीय चेहरा दिखाया। न बेड की ब्लैक न ऑक्सीजन की न दवाओं की। दिल्ली के पंजाबी बाग का एमजीएस सुपर स्पेशियिलिटी अस्पताल दिल्ली का शायद इकलौता ऐसा अस्पताल है जिसने सरकारी अस्पतालों की दर पर कोविड के मरीजो का इलाज किया। अपने पूरे अस्पताल को कोविड अस्पताल बना दिया। यहां तक कि अस्पताल के गलियारों में भी बेड लगा दिए 70 अस्पताल की क्षमता वाले अस्पताल में 105 मरीज भी दाखिल रहे। एमजीएस के चैयरमैन सरदार गुरुशरण सिंह बावा ने 1993 में जब अस्पताल की स्थापना की तो उनका मुख्य उद्देशय मानवता की सेवा था न कि पैसा कमाना। अस्पताल का कोई भी डॉक्टर यदि किसी लैब या फॉर्मा कंपनी से सांठगांठ करते पाया जाता है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है। कोई ऐसा गरीब जिसके पास बिल्कुल पैसा न हो अस्पताल में आ जाता है तो गुरुशरण सिंह बावा अपने निजी खाते से अस्पताल में इलाज के पैसे जमा करा देते हैं। कोराेना के आपदा काल में इस अस्पताल ने मानवता की मिसाल कायम की। अस्पताल की महासचिव तृप्त कौर पाहवा और चैयरमैन के सहायक और ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी सेवीनिवृत कर्नल राजेंद्र सिंह पाहवा हर कोविड मरीज़ से दिन में एक बार ज़रूर मिलते थे। जब उनके अपने सगे भाई बहिन बाहर से ही हाल चाल पूछ कर चले जाते थे इस अस्पताल के अधिकारी कोविड के मरीजों से मिल कर उनका मनोबल बढ़ाते उनको अवसाद से बाहर निकालते। कर्नल पाहवा तो कई बार एंबुलेंस उपलब्ध न होने पर अपनी कार में ही मरीज़ को घर से अस्पताल ले कर आए। ये दिल्ली का एक ऐसा अस्पताल है जिसमें संकट काल में एक दिन भी ऑक्सीजन की आपूर्ति न कम हुई न बाधित हुई। महासचिव तृप्त कौर कहती हैं हम अपने मरीजों, स्टॉफ और सप्लायर के साथ 12 महीने तीस दिन मानवीय संबंध बना कर रखते हैं मुसीबत पड़ने पर नि:स्वार्थ मदद करते हैं। इसीका परिमाण है कि जब पूरी दिल्ली में ऑक्सीजन का हाहाकार मचा था। बड़े-बड़े अस्पताल ऑक्सीजन की कमी के लिए चिल्ला रहे थे हमारे आक्सीजन स्पलायर ने हमें एक दिन भी दिन कमी नहीं होने दी।
कोरोना की दूसरी घातक लहर बहुत कुछ अपने साथ ले गयी तो बहुत कुछ सिखा भी गयी । मेडिकल पेशे से जुड़े कुछ लोगों की काली करतूतें सामने आयीं तो मानवता की अद्भुत मिसालें भी समाज ने पेश की ।

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