जानें क्या है नवरात्र व्रत का वैज्ञानिक आधार

 

 

हमारे देश में अनगिनत त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनमें कुछ राष्ट्रीय व कुछ धार्मिक त्यौहार हैं। हिन्दू संस्कृति के अंतर्गत भी अनेकों त्यौहारों का समावेश होता है। इन्हीें त्यौहारों की शृंखला में नवरात्रों का अपना अलग विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह उत्सव अत्यंत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। लोग देवी मां की उपासना करते हैं व कुछ लोग नौ दिन तक उपवास भी रखते हैं। प्राचीनकाल से ही व्रत त्यौहारों की विभिन्न प्रथाएं प्रचलित हैं। इन प्रथाओं के पीछे भी विशिष्ट कारण निहित होते हैं। यदि किसी को बिना किसी उद्देश्य के व्रत रखने को कहा जाए तो कोई भी नहीं मानेगा, किंतु आस्थावान समाज में लोगों को कोई कथा सुनाकर, उसमें विश्वास जगाकर कुछ भी करने को कहा जाए तो सामूहिक रूप से उसका अवश्यमेव पालन होगा। देवी माता में विश्वास व श्रद्धावश व्रत रखने वालों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है किंतु इन त्यौहारों व इनमें निर्धारित आहार-विहार के आधार में विज्ञान छुपा है, ऐसा कितने लोग जानते हैं? हमारे शास्त्रसम्मत रीति रिवाज़ों के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण भी विद्यमान होता है।
वैज्ञानिक आधार
नवरात्र वर्ष में दो बार वसंत व शरद ऋतु में आते हैं। दोनों समय ऋतु संधिकाल है। ऋतुसंधिकाल में मौसम बदलने के कारण हमारा शरीर अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाता है। वसंत में कफ की वृद्धि व शरद में पित्त की वृद्धि के कारण कफज एवं पित्तज रोगों जैसे जुकाम, बुखार, आंखों के रोग, पेट के रोग व त्वचा के रोगों की भरमार रहती है। इनसे बचाव हेतु अपने शरीर को तैयार करना आवश्यक है, जिसके लिए लंघन अर्थात् उपवास उचित व सटीक उपाय है। ऋतुसंधि पर उपवास को उपवास ही समझकर किया जाए तो ऋतुसंधिजनित विकारों से बचा जा सकता है।
चिकित्सा शास्त्र के अनुसार
अक्षिकुक्षि भवा रोगा प्रतिश्याय व्रण ज्वरा। पंचेते पंचरात्रणि लंघनेन जयेत् सदा।। अर्थात् आंखों व पेट के रोग, जुकाम, व्रण व ज्वर आदि पांचों विकार पांच दिनों के उपवास से ठीक किए जा सकते हैं। इसी सिद्धांत पर आधारित हैं नवरात्रों के व्रत। आजकल लोग उपवास करते अवश्य हैं किंतु कुछ ही लोग इन्हें उचित प्रकार से करते हैं। अधिकतर लोग पहले से भी अधिक तले भुने पदार्थों का सेवन व्रतों के दौरान करते हैं जिनसे शरीर निरोगी न होकर रोगग्रस्त हो जाता है। व्रतों के दौरान फल, दूध, कंदमूल इत्यादि का सीमित मात्र में सेवन करना चाहिए। तले-भुने, अधिक चर्बीयुक्त व गरिष्ठ वस्तुओं के सेवन से बचना चाहिए।

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