संजीवनी है तुलसी

तुलसी शब्द का तात्पर्य होता है, जिस वनस्पति की किसी भी से भी तुलना न की जा सके। तुलसी को हिंदू धर्म में जग जननी का पद प्राप्त है सर्व रोग निवारक जीवन शक्तिवर्धक तथा सस्ती, सुलभ सुंदर उपयोगी वनस्पति मनुष्य के जीवन के लिए और कोई है ही नहीं। गुण धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को ही श्रेष्ठ माना गया है। काली तुलसी से अनेक प्रकार की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है।
तुलसी हिचकी, खांसी, विष, श्वांस रोग और शूल को नष्ट करती है। सिर का भारी होना, पीनस, माथे का दर्द, नासिका रोग, कृमि रोग इत्यादि रोगों को नष्ट करती है।
ऐसा विश्वास है कि तुलसी की जड़ में सभी तीर्थ मध्य में सभी देवी-देवता और ऊपरी शाखाओं में सभी वेद स्थित हैं। इस पौधे में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास स्थल है। जिस प्रकार सूर्य के उगने से अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुलसी का सेवन करने से सारे कष्टों से निपटारा हो जाता है।
खांसी अथवा गला बैठने पर तुलसी की जड़ सुपारी की तरह चूसी जाती है। काली तुलसी का स्वरस लगभग 1 चम्मच काली मिर्च के साथ लेने से खांसी का वेग एकाएक शांत हो जाता है। हिचकी एवं श्वास रोग में तुलसी पत्र स्वरस 10 ग्राम शहद के साथ लेने आराम मिलता है। कुष्ठ रोग में तुलसी पत्र स्वरस प्रतिदिन प्रात: पीने से लाभ मिलता है। दाद, खाज, खुजली नींबू के रस के साथ लेप करने से समाप्त हो जाता है।
तुलसी एक प्रकार से हमारे शरीर का शोधन करने वाली जीवनी शक्ति संवर्धक औषधि है। यह वातावरण से लेकर पर्यावरण तक को संतुलित रखती है। इसलिये तुलसी को संजीवनी कहा जाता है।

 

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