शक्ति के अनुष्ठान का पर्व नवरात्र

आद्यशक्ति माता भगवती दुर्गा ही समस्त संसार को जीवन, ऊर्जा एवं सरसता प्रदान करती हैं। जगत के विविध प्रपंच उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में विलीन हो जाती है। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माता दुर्गा सर्व मंगलकारिणी हैं। उन्हीं की शक्ति से भगवान विष्णु एवं शंकर प्रकट होकर विश्व का पालन और संहार करते हैं।
शास्त्रों में दुर्गा यानि शक्ति को माता और रक्षक कहकर संबोधित किया गया है। मान्यता है कि मूल आद्यशक्ति महामाया है जो दुर्गा है, जिसने समाज में व्याप्त आसुरिक शक्तियों का नाश करने के लिए समय-समय पर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का रूप धारण किया। इस आद्यशक्ति ने जब असुरों के आतंक से देवताओं को मुक्त कराया तब देवताओं को आश्वासन दिया था-
‘ इत्थं यदा-यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।
तदा तदावतीर्यां करिष्याम्यरिसंक्षयम्’
अर्थात् हे देवतागण, जब-जब तुम्हें दानवों की ओर से त्रस्त हो, तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रु का नाश करूंगी। शक्ति के अनुष्ठान का पर्व नवरात्र मात्र अष्टभुजी देवी की आराधना का नाम नहीं है, यह पर्व प्रकृति को पूजने, शक्ति तत्व को जानने, मां की मर्यादा को समझने एवं नारी शक्ति के जागरण का महापर्व है। मनुस्मृति में कहा गया है-‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफलाः क्रियाः।
अर्थात जहां स्त्री जाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं। जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं। इसलिए पुरुष समाज नारी को मात्र भोग्या न मानें, वरन उसके आत्मस्वरूप को भी जानें। मां दुर्गा के नौ स्वरूप माने गए हैं, लेकिन वह विविध रूपों में हमारे आस-पास विद्यमान रहती है। मां, बहन, पुत्री एवं पत्नी के रूप में वह सदा हमारे साथ चलती है, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है, हमारा मार्ग प्रशस्त करती है।
दुर्गा नारी शक्ति का ही प्रतीक है, उनके सभी रूप जीवन व जगत शक्ति के अवतार हैं। नवरात्रि आह्वान है शक्ति की शक्तियों को जगाने का, ताकि सभी प्रकार के क्लेश-कलह, रोग-शोक, भय, आपदाओं का नाश हो सके। नवरात्रि सिर्फ भूखे-प्यासे रहकर विविध कर्मकांडों में समय गंवाना नहीं है, अपितु सच्चे अर्थों में इस महापर्व का अर्थ स्त्री जाति के प्रति पूर्ण अपनत्व व सहचर का भाव रखना है। नारी के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना ही नवरात्रि पूजन का मूल है। -उमेशकुमारसाहू-सु

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