रोगों का सृजनात्मक समाधान है ध्यान

स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन की चाहत भला किसे नहीं होती परंतु कई तरह की कोशिशों के बावजूद विरले ही इसे उपलब्ध कर पाते हैं। ज्यादातर के पल्ले बीमारियां तथा चिंता व तनावजन्य उलझनें ही पड़ती हैं। उन्हें कुंठा, निराशा, हताशा एवं विषाद के बीच उलझते-फंसते हुए ही जिन्दगी गुजारनी पड़ती है।
तनाव आधुनिक युग का अभिशाप बन गया है। इसकी प्रकृति धीमे जहर के समान है। अधिकांश लोग इसके उपचार के लिए महंगी व हानिकारक दवाइयों पर निर्भर रहने की भूल करते हैं जबकि कोई भी दवा तनाव से उत्पन्न बीमारियों को पूरी तरह ठीक करने में सफल नहीं हो सकती। इनका प्रभावी उपचार तो ध्यान क्रि या द्वारा ही संभव है जिसे आज बहुतायत में लोग अपनाने व नियमित सफलतापूर्वक करने का प्रयास कर रहे हैं।
‘योर पावर टू हील’ नामक अपनी प्रसिद्ध कृति में हेरोल्ड शेरमेन ने कहा है कि आज के अतिवादी, भौतिक विकास, आपाधापी, विलासिता एवं असंतुष्ट जीवन का ही यह परिणाम है कि मनुष्य अनुदारता और उच्छृंखलता की दिशा में तेजी से भागता चला जा रहा है। इस कुचक्र में फंसकर उसका शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ाने लगा है,  जिसके कारण तथाकथित अति समृद्धों एवं धन-सम्पन्नों के हिस्से में सिर्फ तनाव एवं अन्य बीमारियाँ ही आई हैं। इन दिनों 95 प्रतिशत से अधिक रोगी तनाव की प्रतिक्रिया स्वरूप रोगग्रस्त पाए जाते हैं।
लगातार सिर दर्द,चक्कर आना, आँखें लाल रहना, आलस्य, स्मृतिह्रास,लकवा आदि रोगों का आक्रमण हो जाना, ये सभी अत्यधिक तनाव के ही दुष्परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मोटापा, मधुमेह, दमा, आर्थराइटिस, कोलाइटिस आदि रोग भी तनाव से पैदा होते हैं। इस प्रकार विश्व के प्राय: सभी मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानियों एवं मनोरोग विशेषज्ञों का यही निष्कर्ष है कि 75 प्रतिशत रोगों का मूल कारण उद्येगजन्य मन: स्थिति – तनाव ही है।
इस महाव्याधि से छुटकारा कैसे
अब प्रश्न उठता है कि इस महाव्याधि से छुटकारा कैसे पाया जाये? विशेषज्ञों का कहना है कि जब इस रोग का मूल कारण शरीर नहीं, मन है तो इलाज भी मन का ही करना उचित होगा। प्रख्यात मनोवैज्ञानिक पादरी नार्मन विन्सेंट पील का कहना है कि ‘मेडिटेट’ एवं ‘मेडीडेट’ दोनों शब्दों का उदगम एक ही है अर्थात दवा करना एवं ध्यान करना दोनों के मूल स्रोत एक ही हैं। इतने पर भी दवा की पहुंच शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों एवं प्रक्रियाओं तक ही सीमित है। मन सूक्ष्म है, जहां तक ‘ध्यान’ के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है और इससे संबंधित बीमारियों को समूल नष्ट किया जा सकता है।
समग्र स्वास्थ्य का वरदान – ध्यान
इन दिनों देश-विदेश के वैज्ञानिक ध्यान के द्वारा उद्विग्नता, तनाव आदि के उपचार हेतु विभिन्न शोध कार्यों में जुटे हैं। सर्वमान्य है कि तनाव एवं उद्विग्नता की स्थिति में त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है जबकि ध्यान क्रिया से गहन विश्राम मिलता है। शोधों से यह निष्कर्ष सामने आया है कि ध्यान करने वाले व्यक्तियों का अंत: संयम अपेक्षाकृत अधिक होता है, साथ ही वे ध्यान न करने वालों की तुलना में कम तनावग्रस्त होते हैं। इसके अलावा ध्यान करने वाले व्यक्ति आसानी से शराब,सिगरेट,काफी आदि नशीले पदार्थों के सेवन से छुटकारा पा जाते हैं।
ध्यान साधना से रक्त में लेक्टेट की मात्रा में स्पष्ट कमी होती है। रक्त में लेक्टेट की वृद्धि उद्विग्नता, उच्च रक्तचाप को सूचित करती है जबकि कमी होने से व्यक्ति के अंदर उत्साह,उमंग और स्फूर्ति की,नवीन चेतना की लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। ध्यान योग से मष्तिष्कीय तरंगों का बिखराव रुकता है। आज पूरी दुनिया ध्यान साधना के लाभों को जान चुकी है और इस क्रिया के चिकित्सकीय प्रमाण भी मिलने लगे हैं। एक ताजा शोध में यह बात सामने आई है कि जो स्त्रियां नियमित रूप से ध्यान योग करती हैं, उनका प्रतिरोधी तंत्र अत्यंत विकसित हो जाता है और उनमें स्तन कैंसर की संभावनाओं में कमी आती है। इसी प्रकार ध्यान क्रिया से होने वाले अनेक लाभ आज विज्ञान की कसौटी पर खरे उतर चुके हैं।
ध्यान में लगायें ध्यान
अत: ध्यान के इन प्रभाओं को देखते हुए अच्छा यही है कि व्यक्ति अपना ध्यान दुनिया के लुभावने विज्ञापनों और हानिकारक तथाकथित चिकित्सा पद्धतियों से हटाकर ‘ध्यान’ में लगायें। ध्यान साधना की यह यात्रा निश्चित रूप से आपके जीवन में खुशियां, मन में उत्कृष्ट चिंतन और हृदय में परिष्कृत भावनाओं को अंकुरित करने में सहायक सिद्ध होगी।

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