आखिर कौन था पहला कांवड़िया ?

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बहुत खास है इस बार की कावड़ यात्रा
4 जुलाई से सावन के साथ ही कांवड़ यात्रा भी एक बार फिर शुरू हो गई है । इस बार अधिमास की वजह से दो श्रावण हैं अतः चार के स्थान पर आठ सोमवार के व्रत होंगे। पहला सोमवार 10 जुलाई को तो आठवां अगस्त के अंत में पड़ेगा ।अधिकमास के चलते कांवड़ियों को यात्रा करने के लिए अधिक समय मिलेगा इस बार। अधिकमास के स्वामी भगवान विष्णु हैं और सावन मास के स्वामी भगवान शिव इसलिए श्रद्धालुओं को सावन में भगवान विष्णु व भगवान शिव दोनों की ही कृपा प्राप्त होगी।
सावन के दो महीने होने से श्रद्धालु इस बार असमंजस में हैं है कि कांवड़ यात्रा कब तक चलेगी। इस बारे में धर्म गुरु कहते हैं कि कांवड़ यात्रा सावन शिवरात्रि तक ही चलेगी और शिवरात्रि का जल 16 जुलाई तक ही चढ़ेगा और उसी दिन तक कांवड़ यात्रा चलेगी। इसके बाद सावन मास में व्यक्तिगत रूप से कांवड़ लाना चाहें तो ला सकते हैं ।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रति वर्ष सावन माह में शिव भक्त गंगातट से कलश में गंगाजल लाते हैं और उसको कांवड़ पर अपने क्षेत्र के शिवालयों में लाते हैं और शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं।
हिंदुओं की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा करने से भगवान शिव भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं और सभी संकटों को दूर करते हैं। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सावन का महीना देवों के देव महादेव को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस पूरे महीने में जो भी उपासक भगवान महादेव का पूजन, अर्चन, अभिवंदन और स्तवन पूरे मनोयोग और विधिविधान के साथ करता है, आशुतोष उस पर प्रसन्न होते हैं और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
पुराणों के अनुसार कांवड़ यात्रा भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल रास्ता है। कैसे शुरू हुई कांवड़ यात्रा की परंपरा यह जानना कांवड़ के मौसम में सम्यक रहेगा। और यह जानना और भी रोचक होगा कि पहला कांवड़िया कौन था। अलग-अलग मिथकों के अनुसार परशुराम से लेकर श्रवण कुमार तक को पहला कांवड़िया होने के प्रसंग मिलते हैं।
पहला कांवड़िया कौन?
परशुराम
एक मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहले कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। माना जाता है कि परशुराम गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर आए थे और वर्तमान उत्तर प्रदेश के बागपत के निकट स्थित ‘पुरा महादेव’ का गंगाजल से अभिषेक किया था। उस समय सावन मास ही चल रहा था, इसी के बाद से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई । आज भी लाखों भक्त गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर पुरा महादेव पर जल अर्पित करते हैं।
भगवान राम
आनंद रामायण के अनुसार भगवान राम पहले कांवड़िया थे। इस मिथक के अनुसार भगवान राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था। उस समय भी सावन मास ही चल रहा था।
शिवभक्त रावण
कुछ प्राचीन ग्रंथों में रावण को भी पहला कांवड़िया बताया गया है। समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान शिव ने हलाहल पान किया था, तब भगवान शिव का कंठ नीला हो गया था और वे तभी से नीलकंठ कहलाए थे। लेकिन हलाहल विष के पीने के बाद नकारात्मक शक्तियों ने भगवान नीलकंठ को घेर लिया था। तब रावण ने महादेव को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त के लिए ध्यान किया और गंगाजल भरकर ‘पुरा महादेव’ का अभिषेक किया, जिससे महादेव नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्त हो गए थे। तभी से कांवड़ यात्रा की परंपरा भी प्रारंभ हो गई।
आज्ञाकारी श्रवण कुमार
कतिपय विद्वानों की मान्यता है कि सबसे पहले त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने कांवड़ यात्रा शुरू की थी। श्रवण कुमार ने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जाने के लिए कांवड़ बैठाया था। श्रवण कुमार के माता पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की थी, माता पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार कांवड़ में ही हरिद्वार ले गए और उनको गंगा स्नान करवाया। वापसी में वे गंगाजल भी साथ लेकर आए थे। बताया जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई थी।
देवगण
इस मान्यता में बताया गया है कि समुद्र मंथन के दौरान जब महादेव ने हलाहल विष का पान कर लिया था, तब विष के प्रभाव को दूर करने के लिए भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाया गया था। ताकि विष के प्रभाव को जल्दी से जल्दी कम किया जा सके। सभी देवता मिलकर गंगाजल से जल लेकर आए थे और भगवान शिव का जलाभिषेक किया। यह अभिषेक भी सावन में ही हुआ था। कहा जाता है कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई ।
क्या है खास इस बार ?
प्राय: हर तीन वर्ष बाद तेरहवां महीना आता है, जिस ज्योतिषाचार्य की भाषा में मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। जनसामान्य इसे अधिमास के नाम से भी जानते हैं। भारतीय हिंदू कैलेंडर सौम मास और चंद्र मास की गणना के हिसाब से चलता है।मलमास या अधिकमास की शुरुआत 18 जुलाई 2023 से शुरू होकर 16 अगस्त 2023 तक चलेगा। वहीं सावन 4 जुलाई से आरंभ होकर 31 अगस्त तक यानी लगभग दो महीने चलेगा। यह संयोग लगभग 19 वर्षों बाद घटित हो रहा है, जिसे ज्योतिविंदो के अनुसार, भगवान के पूजन की दृष्टिकोण से यह बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
पुरुषोत्तम मास क्या , स्वामी कौन ?
कहा जाता है कि प्राचीन काल में भगवान विष्णु से मलमास ने कहा कि हे भगवान, मेरा स्वामी कौन सा देवता होगा क्योंकि सभी देवताओं ने मलमास का स्वामी होने से इन्कार दिया था। तब भगवान विष्णु ने मलमास को कहा कि मैं तुम्हारा स्वामी होऊंगा। बस तभी से इस महीने में भगवान विष्णु का ही विशेष पूजन और अर्चन किया जाने लगा। अतः खास बात यह है कि इस बार कावड़ यात्रा के दौरान भक्तों को भगवान शिव के साथ-साथ भगवान विष्णु की भी विशेष कृपा प्राप्त होगी।
डॉ घनश्याम बादल

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