इंटरस्टीशियल लंग डिजीज

 

 

आज विश्व में आईएलडी कोविड के कारण मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। यह आज एक चर्चित बीमारी के रूप में फैल रहा है आइये जानते हैं आईएलडी क्या है-

यह (इंटरस्टीशियल लंग डिजीज) एक बीमारी का समूह है जो फेफड़ों के वायुकोषों के बीच की जगह (इंटरस्टीशियम) को प्रभावित करता है। इसमें वायुकोषों के बीच की कोशिकाएं मोटी हो जाती हैं। व्यक्ति सही प्रकार से सांस नहीं ले पाता व ऑक्सीजन की उचित मात्रा रक्त में नहीं पहुंच पाती।

इंटरस्टीशियल लंग डिजीज इसे फेफड़ों में फाइब्रोसिस होना भी जाना जाता है जो फेफड़ों में सूजन या घाव कर देता है। फेफड़ों फाइब्रोसिस का कारण शरीर के रोग प्रतिरोधक तंत्र (इम्यून सिस्टम) में आई गड़बड़ी से संबंधित होता है। सूजन और जख्म के कारण शरीर में पर्याप्त ऑक्सीजन न करने पर शरीर को ऑक्सीजन प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसका मुख्य कारण आज के समय में कोविड इन्फेक्शन को माना गया है। वैसे तो धूम्रपान, धूल धक्कड़, जहरीली गैस का रिसाव, श्वास की बीमारी आदि को इस बीमारी का कारण माना जाता रहा है।

टीबी की तरह ही वजन घटना, सांस फूलना, सूखी खांसी आना, भूख कम लगना जैस इसके लक्षण हैं। यही कारण है कि आईएलडी के 67 फीसदी मरीज जानकारी के अभाव में टीबी का इलाज करवाते रहते हैं। टीबी में बुखार और कई बार खांसी में खून भी आता है, बस यही दो लक्षण ईएलडी को टीबी से अलग करते हैं। आईएलडी का पता एक्स-रे में भी नहीं चलता है। इसमें फेफड़े पर धब्बे नजर आते हैं जो टीबी के समान होते हैं। इसकी पहचान के लिए हाई रिजॉल्यूशन थोरैक्स सीटी करवाना होता है। इसका इलाज भी काफी मुश्किल है। आईएलडी महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में अधिक पाया जाता है। इसके अलावा गठिया मरीजों को भी आईएलडी का खतरा ज्यादा रहता है।

अगर आप मुर्गी, बत्तख, कबूतर व अन्य पक्षियों का पालन करते हैं तो आपको भी यह बीमारी हो सकती है, क्योंकि पक्षियों के पर से निकले वाले छोटे कण सांस के जरिये अंदर जाते हैं और उससे भी यह बीमारी होती है। इसके अलावा कूलर में पानी गंदा होने के बाद उसमें फंगस आ जाता है तो उसकी हवा खाने से भी लोग बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। वहीं, घरों के गंदे पर्दे, कालीन, सोफा आदि की धूल समेत ऐसे व्यवसाय जो धूल आदि से जुड़े हैं वहां के कर्मचारी भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं।

एक दिन में हमें 350 लीटर ऑक्सीजन की जरूरत होती है। एक बार में हम आधा लीटर सांस लेते हैं लेकिन इस बीमारी में महज 21 फीसदी ही ऑक्सीजन जाती है। इस बीमारी में फेफड़े में ऑक्सीजन कम हो जाती है। इसके चलते फेफड़े के निचले हिस्से में यह इंफेक्शन शुरू होता है इसके बाद धीरे-धीरे यह फेफड़े की बाहरी परत को भी चपेट में ले लेता है।

होम्योपैथिक दवा

एसपीडोसपरमीनम 30 – यह एक फेफड़े को सुचारु रूप से कर रक्त में ऑक्सीजन लेबल को बढ़ाने में एक बहुत ही कारगर दवा है। यह दवा कई रोगियों को वेंटिलेटर से उतारने में सफल रहा है। इसे अपने चिकित्सक के सलाह पर ही व्यवहार करे।

बेरी​लियम मेटालिकम 30 – फेफड़े के सूजन होकर फेफड़े में ग्रेन्युलोमा बनने पर यह बहुत ही कारगर औषधि है। असहनीय खाँसी, एज्मा और साथ ब्रोन्कियल कैंसर के रोगियों के लिए भी व्यवहार किया जाता है।

फासफोरस 30 – छाती में जलन, दर्द, इन्फेक्शन, कफ में खून आना, श्वाँस में कष्ट, फेफड़े में फाइब्रोसिस पर यह अच्छा काम करते देखा गया है। अन्य होम्योपैथिक दवा जो आप चिकित्सक के सलाह पर लिया जा सकता है, जैसे आर्सेनिक एल्बम, इपीकाक,नेट्रम सल्फ, ऐन्टीम टार्ट , कुप्रम मेट, नक्स वोमिका, स्टेनम मेट, कस्टीकम, सीपिया, सायलिसिया, हिपर स्लफ, लेकेसिस, काली सल्फ, क्रीयोजोट, आर्सेनिक आयोड, काली बायक्रोम, ब्रायोनिया, बेलाडोना, …. इत्यादि।

 

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