साल का पहला शनि प्रदोष व्रत, इस तरह भगवान शिव और शनिदेव को करें प्रसन्न

कोलकाता : हर महीने शुक्ल व कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत मनाया जाता है, त्रयोदशी तिथि शनिवार को पड़ती है तो इसे शनि प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। इस बार यह शुभ तिथि 15 जनवरी दिन शनिवार को है। हर महीने दो बार त्रयोदशी तिथि आती है, इसी तरह 12 महीनों में कुल 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। यह व्रत भगवान शिव और माता शक्ति को समर्पित होता है। मान्यता है कि शनि प्रदोष का व्रत करने से भगवान शिव के आशीर्वाद के साथ-साथ शनि दोष से भी मुक्ति मिलती है क्योंकि भगवान शिव ने शनिदेव को न्याय का देवता बनाया था। इसलिए प्रदोष व्रत के करने से शनि से संबंधित कोई दोष नहीं लगता है और शनि देव की कृपा प्राप्त होती है।

शनि प्रदोष व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर निसंतान दंपत्ति संतान सुख की कामना के लिए शनि प्रदोष व्रत करते हैं, उनको जल्द संतान सुख की प्राप्ति होती है और मनोकामना पूरी होती है। अगर किसी व्यक्ति को भगवान शिव के साथ-साथ शनिदेव को भी प्रसन्न करना है तो शनि प्रदोष व्रत करना चाहिए। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने प्रदोष तिथि के दिन ही सृष्टि की उत्पत्ति की थी और इसी तिथि पर ही इसका विलय भी करेंगे। जिन राशियों में शनि की ढैय्या और साढ़ेसाती का प्रभाव चल रहा है, उनको भी शनि प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी जाती है। साल में केवल तीन या चार बार ही शनि प्रदोष व्रत पड़ता है।

प्रदोष व्रत करने से शनिदेव की कृपा होती है प्राप्त
शनिदेव ने भगवान शिव को गुरु का दर्जा दिया है। इसलिए शनि प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। क्योंकि इस दिन शनि से संबंधित दोष निवारण करने के लिए बेहद उपयुक्त माना गया है। इस व्रत के करने से शनि की साढ़े साती, शनि की ढैय्या, शनि दोष का प्रभाव काफी कम हो जाता है। इसके अलावा प्रदोष व्रत का शनिवार के दिन पड़ने से धन समेत सभी दुखों का अंत होता है और मनोकामना पूरी होती हैं। वैसे तो प्रदोष व्रत भगवान शिव से संबंधित है लेकिन शनिवार के दिन प्रदोष व्रत के पड़ने से शनिदेव की भी पूजा की जाती है। इसलिए इस दिन व्रत करने से भगवान शिव और शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है।
शनि प्रदोष व्रत में क्या करें
जब सूर्य अस्त होने लगता है और रात की शुरुआत होती है तब उस काल को प्रदोष कहा जाता है। इसी काल में भगवान शिव स्वयं शिवलिंग में प्रकट हो जाते हैं इसलिए इस समय भगवान शिव की पूजा और मंत्रों का जप करना चाहिए। ऐसा करने से जातक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को किसी भी उम्र का इंसान रख सकता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करने के बाद शनिदेव को तेल अवश्य चढ़ाना चाहिए। साथ ही दशरथ कृत शनि स्त्रोत या शनि चालीसा का पाठ करना चाहिए और पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

कुंडली में ग्रहों की स्थिति होती है मजबूत
सर्व कार्य सिद्धि हेतु शास्त्रों में बताया गया है कि अगर कोई 11 या साल में सभी त्रयोदशी का व्रत करता है, उनकी समस्त मनोकामना व कार्य पूरे हो जाते हैं। प्रदोष व्रत के रखने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति भी सही रहती है और शुभ फलों की प्राप्ति होती है। चंद्रमा की स्थिति में सुधार आने से कुंडली में शुक्र और की स्थिति भी सही हो जाती है। मान्यता है कि प्रदोष व्रत के करने वाले व्यक्ति पर शनिदेव कभी भी कुदृष्टि नहीं डालते हैं।
शनि प्रदोष व्रत विधि
– प्रदोष तिथि वाले दिन जातक ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान व ध्यान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग की विधिपूर्वक पूजा करें।
– शिवलिंग पर पूजा में धतूरा, बेल पत्र, फूल, गंगाजल, दूध, जल, अक्षत, चंदन आदि अर्पित करें और माता पार्वती को सुहाग का सामान अर्पित करें। भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के बाद शनिदेव की भी पूजा करें।
– प्रदोष काल अर्थात शाम के समय में दोबारा स्नान करके सफेद कपड़े पहने और फिर भगवान शिव की पूजा करें और प्रदोष व्रत की कथा सुनने के बाद महामृत्युंजय मंत्र का जप अवश्य करें। उसके बाद शनिदेव के मंदिर में जाकर सरसों का तेल अर्पित करें और दशरथ कृत शनि स्त्रोत का पाठ करें।
– शाम की पूजा-पाठ करने के बाद अन्न-जल ग्रहण किया जा सकता है। फिर रात्रि भगवान शिव का जागरण करना चाहिए।

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